प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर बागेश्वर जिला राज्य के हजारों बेरोजगारों को रोजगार देने में सक्षम है बावजूद इसके जिले में 30 हजार बेरोजगारों की फौज खड़ी है। यह हाल तब हैं जब इस जिले खड़िया खनन से ही हर साल 150 करोड़ का कारोबार होता है।
बागेश्वर सोप स्टोन के लिए प्रसिद्ध है। रीमा से लेकर कांडा तक पाई जाने वाली खड़िया की देश भर में बड़ी मांग है। साबुन, पेपर, टूथपेस्ट, पालिश सहित सौंदर्य प्रसाधन की तमाम सामग्री सोप स्टोन से ही तैयार की जाती है। पेपर मिलों में खड़िया की सबसे अधिक मांग रहती है। वर्तमान में बागेश्वर की 67 से अधिक खदानों से लगभग तीन लाख टन खड़िया निकाली जाती है। खड़िया के इस कारोबार का सालाना टर्नओवर 150 करोड़ है। इससे लगभग 20 करोड़ रुपए सरकार की झोली में भी जाते हैं। परंतु यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिन लोगों की जमीनों को खोदकर सफेद सोना निकालने के बाद मैदानों को भेजा जाता है उसी पहाड़ी जिले के लोग रोजगार के लिए दर-दर भटकते हैं। प्रदेश में ऊर्जा, पर्यटन और फलोत्पादन से रोजगार देने के दावे करने वाले राजनैतिक दलों के नेता बागेश्वर में उद्योग लगाने की पहल तक नहीं कर सके। जबकि साबुन, टूथपेस्ट सहित सौंदर्य प्रसाधन की तमाम फैक्ट्रियां यहां पर लगाकर लाखों बेरोजगारों को रोजगार दिया जा सकता था। परंतु कच्चे माल को ट्रकों में लादकर मैदान को भेजने के अलावा इसका स्थानीय स्तर पर उपयोग करने की दिशा में काम ही नहीं हुआ। यही हाल जिले की जड़ी-बूटी का भी है।
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली जड़ी बूटी को 16 साल बाद भी रोजगार से नहीं जोड़ा जा सका है। सामाजिक कार्यकर्ता एनबी भट्ट का कहना है कि प्रदेश के नेताओं को अपना घर भरने से फुरसत नहीं है। संसाधनों की खुली लूट मची है। बेरोजगारों को रोजगार देने के बजाय कोरे सपने दिखाए जाते हैं। यदि वाकई नेताओं को पहाड़ की चिंता है तो स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का लाभ बेरोजगारों केे दिलाएं।