ग्राम पंचायत कपकोट की मनोरम पहाड़ी पर स्थित श्री श्री 1008 काशिल देव के मंदिर पर क्षेत्र के लोगों की गहरी आस्था है। पहले जब पंचाग नहीं होते थे तक काशिल देव लोगों को तिथि, वार और पर्वो की पूर्व सूचना देते थे। काशिल देव रिद्धि-सिद्धि और विद्या देने के लोक देवता माने जाते हैं।
लोगों का विश्वास है कि जो भी व्यक्ति मंदिर में सच्ची भावना से पूजा अर्चना करते हैं उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मंदिर में हर साल तीन गते बैशाख को क्षेत्र का सुप्रसिद्ध स्याल्दे बिखौती का मेला लगता है। इस बार यह मेला 16 अप्रैल को लगेगा। काशिल देव का मंदिर पहले बहुत छोटा था। क्षेत्रवासियों के सहयोग से मंदिर का भव्य निर्माण किया गया। मंदिर परिसर में मां भगवती, राधा-कृष्ण, हनुमान, बाण देवता और राजा रत कपकोटी की कन्या बाली कुसुमा के मंदिर भी हैं।
काशिल देवता राजा रत कपकोटी के आराध्य रहे हैं। राजा जो भी फैसले लेते थे उन्हीं की आज्ञा से लेते थे। काशिल देव गांव में होने वाली हर अप्रिय घटना की सूचना लोगों को पहले ही दे देते थे। गांव के पूर्व प्रधान नारायण सिंह कपकोटी बताते हैं कि काशिल देव को ओलावृष्टि से फसलों और क्षेत्र में अनिष्ट होने से बचाने की अद्भुत सिद्घि प्राप्त है।
मेले के दिन लोग नए अनाज से बना प्रसाद भगवान को अर्पित करते हैं। मंदिर में कथा, भागवत, रामायण, सत्य नारायण देव की कथा पूजन भी होते रहते हैं। मंदिर के पुजारी उपाध्याय, जबकि पूजा पाठ के लिए जोशी परिवार नियुक्त हैं। मंदिर परिसर से सरयू नदी से लेकर हिमालय का विहंगम दृश्य दिखाई देने से यह क्षेत्र पर्यटकों के आकर्षण का भी प्रमुख केंद्र है। ग्लेशियरों की यात्रा में जाने वाले पर्यटक भी मंदिर के दर्शन को आते हैं।