बागेश्वर। उत्तरायणी मेला जिले के गरिमामय इतिहास का अभिन्न अंग रहा है। समय के साथ मेले में कई बदलाव आए, लेकिन मेले ने अपना पुरातन स्वरूप किसी न किसी रूप में जीवित रखा है। अतीत में जाएं तो मेला समृद्ध व्यापारिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की तस्वीर पेश करता है। पुराने समय में मेला वस्तु विनिमय का गवाह रहा है।
आजादी के आंदोलन में कुली बेगार प्रथा को समाप्त करने के लिए वर्ष 1921 में हुए आंदोलन के साथ मेले का महत्व आसपास के इलाकों में भी बढ़ने लगा था। इसके साथ ही मेले का स्वरूप भी बदलने लगा। मेले में बाहरी और सीमांत के व्यापारियों की आवाजाही बढ़ने लगी थी। बुजुर्ग बताते हैं कि मेले में दूरदराज के गांवों से लोग साल भर का गुड़, तेल और अन्य जरूरी सामान लेने आते थे, जिसके बदले में वह स्थानीय उत्पाद व्यापारियों को देते थे। इस तरह से मेले में वस्तु विनिमय (आदान-प्रदान) को बढ़ावा मिला। इसके अलावा सांस्कृतिक विरासत के आदान-प्रदान का भी मेला मुख्य माध्यम था। मेले के दौरान पूरे जिले के लोग बाजार में एकत्र होते थे। (संवाद)
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जागरण की रात नगर में सजती थी झोड़ा-चांचरी की महफिल
बागेश्वर। मकर संक्रांति की पहली रात को जागरण की रात कहा जाता है। बागनाथ मंदिर में कई टोलियां रात्रि जागरण करतीं थीं। प्राचीन समय में बाजार में कई जगहों पर झोड़ा, चांचरी, भगनौल और न्योली गायन की महफिलें सजतीं थीं। बाजार में भोजन, चाय की दुकानें रात भर खुली रहती थी। चौक बाजार और बाजारी गोल्ज्यू मंदिर में अलाव की व्यवस्था की जाती थी। नुमाइशखेत मैदान में लगने वाले लकड़ी के चरखे और झूूूलों का भी मेलार्थी आनंद लेते थे। मेले में त्रिमाघी स्नान के लिए दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु तीन दिनों तक मंदिरों या सरयू बगड़ में डेरा डाले रहते थे। इस बार कोरोना के कारण सांस्कृतिक कार्यक्रम भी नहीं होंगे। (संवाद)
मेला देखने तीन दिन पहले ही निकल जाते थे घर से
1958 से मैंने उत्तरायणी कौतिक देखा है। उस समय यातायात के साधन सीमित थे। मेलार्थी झुंड बनाकर गांवों से मेला देखने आते थे। मल्ला दानपुर के लोग तीन दिन पहले गांव से निकलते थे और दो पड़ाव के बाद लोग बागेश्वर पहुंचते थे। ग्रामीण अपने साथ दन, थुलमा, डलिया और स्थानीय स्तर पर होने वाले उत्पाद लाते थे, जिनके बदले में साल भर के लिए गुड़, तेल, मसाले, नमक लेकर जाते थे। बर्फीले इलाकों के लोग बकरियों का झुंड (ढाकर) लेकर आते थे। पैरों को ठंड से बचाने के लिए वह छबेली (जूते के आकार का ऊन से बना कपड़ा) पहनते थे। उस समय धन का अभाव रहता था, लेकिन मानवता का महत्व था। (संवाद)
केशवानंद जोशी (76)
जौलजीबी नौ लाख की, उत्तरायणी एक लाख की
साठ-सत्तर के दशक में कहावत थी कि जौलजीबी नौ लाख की, उत्तरायणी एक लाख की। यानी उस समय भी मेले में लाखों का कारोबार होता था, जो मेले के व्यापारिक महत्व का प्रतीक था। मेले में पटुवा व्यापारियों का दबदबा रहता था। वह चूड़ी, चरेऊ, अंगूठी आदि शृंगार की सामग्री लेकर आते थे। माघ महीने के दस गते को पटवा व्यापारी बागनाथ मंदिर में ध्वज चढ़ाते थे, जो मेला समापन का प्रतीक माना जाता था। नगर के व्यापारियों के लिए कमाई का प्रमुख स्रोत उत्तरायणी मेला हुआ करता था। (संवाद)
रतन सिंह रावल (62)
युवाओं को सेना भर्ती के लिए प्रेरित करते थे सैनिक
1965 से उत्तरायणी मेला देखता आया हूं। मेले में रानीखेत से आने वाला सेना का बैंड आकर्षण का केंद्र होता था। सेना बैंड के साथ आए सैनिक मनोरंजन के साथ युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित भी करते थे। उस समय मेला रोमांच पैदा करता था। बाजार में मेले के कई दिन पहले से ही व्यापारी तैयारी में जुट जाते। बाजार में अलाव जलने लगते। नगर में रहने वाले रिश्तेदारों के रहने का प्रबंध करते थे। जागरण की पूरी रात लोग बाजार में घूम-घूम कर लोकगीत गाते थे। जागरण की रात से त्रिमाघी तक बाजार में यही माहौल रहता। घरों में रहने वाले भी जागकर सुरीले लोकगीतों का लुत्फ उठाते थे। (संवाद)
हीरा सिंह भरड़ा (72)