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आज के ही दिन मिली थी कुली उतार आंदोलन को सफलता

Wed, 13 Jan 2016 11:06 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर।
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 भगवान बागनाथ की नगरी में 14 जनवरी से शुरू हो रहे उत्तरायणी मेला धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है वहीं इसका योगदान देश की आजादी के इतिहास में भी स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। 1921 में इसी धरती में 14 जनवरी को कुली उतार आंदोलन को सफलता मिली थी।
स्कंद पुराण के अनुसार अनादिकाल में शिवजी के परम गण चंडीश ने इस नगर को बसाया था। उनके द्वारा बसाए इन नगर को भोलेनाथ ने काफी पसंद किया और माता पार्वती के संग यहीं विराजने का निर्णय लिया।
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वैसे मंदिर में श्रद्धालु हर समय जलार्पण कर पूजा अर्चना करते रहते है, लेकिन माघ महीने में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर यहां उत्तरायणी का मेला लगता है।
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 मकर संक्रांति के पर्व पर 14 जनवरी 1921 को कूर्मांचल केसरी बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में सैकड़ों लेागों ने यहां कुली उतार, बेगार और बदार्यश जैसे अंग्रेजी शासन के काले कानूनों के रजिस्टरों को सरयू में बहा दिया था। मकर संक्रांति के दिन लिए गए इस निर्णय से जहां अंग्रेज भौचक रह गए थे वहीं कूर्मांचल में आजादी के आंदोलन की ज्वाला भी तेज हो गई। इस आंदोलन को मिली सफलता पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बहुत खुश हुए और उन्होंने 28 जून 1929 को यहां आकर आंदोलनकारियों की पीठ थपथपाई। यही वजह है कि मकर संक्रांति के पर्व पर राजनीतिक दल ऐतिहासिक सरयू बगड़ में सभा करके वर्षभर के कार्यक्रम तैयार करते हैं। यह मेला सांस्कृतिक दृष्टि से भी काफी महत्व रखता है। लोग मीठे आटे से बने घुघुते बनाते हैं। बच्चे घुघुतों की माला को गले में डालकर कौओं को अपने पास बुलाकर खिलाते हैं। विवाहिता बहिनें इस पर्व पर अपने मायका आती हैं।


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