देश के दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उड़ीसा जैसे राज्यों में ऐतिहासिक धरोहरों की बदौलत पर्यटन फलफूल रहा है। जबकि उत्तराखंड ऐसा प्रदेश है जहां राज्य गठन के डेढ़ दशक बाद भी पुरातात्विक धरोहरों को सहेजकर पर्यटन में शामिल करने के कोई प्रयास नहीं किए गए। सुरक्षा के नाम पर जहां एक ओर सदियों पूर्व निर्मित बेजोड़ वास्तुकला वाली देवी-देवताओं की 191 मूर्तियां कोठरियों में कैद हैं, वहीं बुनियाद के कमजोर होने से मंदिरों को खतरा पैदा हो गया है।
बागेश्वर की कत्यूर घाटी भले कंक्रीट की इमारतों में तब्दील हो रही हो, लेकिन सदियों से यहां खड़े मंदिर समूह और देवी-देवताओं की मूर्तियां कत्यूर राजाओं के वैभवशाली इतिहास को आज भी बयान करती हैं। इसी घाटी को कत्यूर राजाओं ने अपनी राजधानी बनाया। ताम्रपत्रों के अनुसार बेजोड़ शिल्पकला और विशेष शैली में निर्मित बैजनाथ मंदिर और बागनाथ मंदिर सहित आसपास के दर्जनों देवालयों का निर्माण कत्यूर राजाओं ने आठवीं से 18वीं सदी तक कराया था। इन मंदिरों में पत्थर से लेकर अष्टधातु तक की बेशकीमती मूर्तियां शामिल हैं।
1970 के दशक तक यह मूर्तियां इन्हीं मंदिरों में रखी गई थीं। इसके बाद पुरातत्व विभाग ने बेशकीमती मूर्तियों को उठाकर एक कोठरी में रख दिया गया। बैजनाथ मंदिर परिसर के एक कक्ष में ऐसी ही 122 दुर्लभ मूर्तियां पिछले 31 वर्षों से बंद हैं। इन मूर्तियों की सुरक्षा पर हर साल लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। कोठरी में बंद होने से इन बेशकीमती मूर्तियों के कोई दर्शन नहीं कर सकता है। यहां आने वाले इतिहास के जिज्ञासु और शोधार्थियों को भी निराशा हाथ लगती है। इसी तरह से बागनाथ मंदिर में भी सदियों पुरानी 69 मूर्तियां एक कक्ष में रखी गई हैं।
इन मूर्तियों को भी चोरी चले जाने के डर से आठवीं सदी में निर्मित मंदिरों से उठाकर कोठरी में बंद किया गया है। मूर्तियों को उठाकर कोठरी में बंद करने से गगनचुंबी सत्यनारायण, विष्णु मंदिर, रक्षा देवल और लक्ष्मी नारायण जैसे मंदिर वर्षों से वीरान पड़े हैं। विडंबना है कि राज्य बनने के बाद भी न तो इन मूर्तियों को मंदिरों में वापस स्थापित करने की पहल की गई और न ही ऐसा संग्रहालय बनाया गया जहां लोग सदियों पहले निर्मित विशेष कलाकृतियों को देख सकते। इतना ही नहीं ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बैजनाथ मंदिर बुनियाद के धंसने से 18 डिग्री के कोण पर झुका हुआ है, परंतु इसे दुरुस्त करने के आज तक प्रयास नहीं हुए हैं।