सवाल संगठन ने प्रदेश सरकार पर वन विभाग के अपरिपक्व अध्ययन से पहाड़ी की विरासतों के साथ अनैतिक व्यवहार करने का आरोप लगाया है। संगठन का कहना है कि हिमालयी बुग्यालों में पशु चराने की परंपरा 10 हजार साल पुरानी है।
सवाल संगठन की मंगलवार को तहसील रोड स्थित एक होटल में बैठक हुई। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि प्रदेश सरकार का वन विभाग अपने अपरिपक्व अध्ययन के सहारे पहाड़ की विरासतों के साथ जो अनैतिक व्यवहार कर रहा है उसके खिलाफ संगठन चुप नहीं बैठेगा। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में भेड़ चरान और गूर्जरों का भैंस चरान दस हजार वर्ष से अधिक पुरानी आर्थिक परंपरा है। वहीं वन विभाग महज 150 साल पुराना है। वन विभाग को इतना पता होना चाहिए कि वनों और बुग्यालों में भेड़ और भैंस चराने से कई तरीकों से जंगल समृद्ध होते हैं। आरोप लगाया कि हिमालयी वनों की बर्बादी का मुख्य कारण वन विभाग का प्रबंधन है।
संगठन ने तय किया है कि सरकार द्वारा वन अधिनियम में किये जा रहे व्यापक बदलाव से पहाड़ी ग्रामीणों की कृषि और जनजीवन पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभावों पर व्यापक मंथन के लिये प्रदेश की संघर्षशील ताकतों की बैठक 15 जून को बागेश्वर में आयोजित की जाएगी।
बैठक में पंचायती वनों का संचालन ग्राम वनों की तर्ज पर करवाने के सरकारी षडयंत्र, चिपको के साइड इफेक्ट, वन विभाग का असफलता की वजह से जल स्रोतों का घटना, हिमालय का सिकुड़ना, भूस्खलन व भू-कटावों में व्यापकता आना और वन अधिनियम में व्यापक स्तर पर बदलाव की असल मनसा पर व्यापक स्तर पर जन हित में विचार विमर्श किया जायेगा।
बैठक में रमेश पांडे कृषक, गिरीश तिवारी, राजेंद्र सिंह, सुमित्रा पांडे, आनंद सिंह, विनोद जोशी आदि शामिल थे।