जिला उपभोक्ता फोरम ने पालिसीधारक के नामिनी को दो लाख के क्लेम के साथ ही मानसिक कष्ट और वाद व्यय के 30 हजार रुपए का भी भुगतान करने के निर्देश भारतीय बीमा निगम एलआईसी को दिए हैं। बीमाधारक को बीमारी छिपाने का दोषी मानते हुए निगम ने क्लेम देने से इनकार कर दिया था। मानसिक कष्ट और वाद व्यय की राशि अधिकारियों से वसूल होगी।
जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष जिला जज डा. जीके शर्मा, सदस्य संजय कुमार लोहनी, मीना फर्त्याल ने बुधवार को इसका फैसला सुनाया है। कांडा निवासी गणेश चंद्र्र पांडे यहां बागनाथ स्टेशनरी प्रेस में काम करते थे। उन्होंने 15 जुलाई 2011 को एलआईसी की बागेश्वर शाखा में दो लाख का बीमा करवाया। इसमें उन्होंने अपने पुत्र कमलकिशोर पांडे को नामिनी बनाया था। दूसरे साल पांच अप्रैल को उनका स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। छह अप्रैल को सुधार होने पर अस्पताल से छुट्टी मिल गई। उसी दिन घर आने पर उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद मृतक के नामिनी कमल पांडे ने दावे के लिए क्लेम किया।
एक मार्च 2013 को एलआईसी के हल्द्वानी स्थित मंडल कार्यालय ने इस दावे को खारिज कर दिया था। अस्पताल के कागजात दिखाते हुए बीमा अधिकारियों का कहना था कि बीमाधारक को क्रोनिक एब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सांस की नली और फेफड़ों का रोग) था। यह बीमारी लंबे समय की होती है। बीमाधारक को पहले से ही यह बीमारी थी। उन्होंने इस तथ्य को छिपाकर धोखे से बीमा ले लिया। इसलिए वह क्लेम के हकदार नहीं हैं। इस आदेश के विरुद्ध कमल पांडे ने एलआईसी के क्षेत्रीय कार्यालय कानपुर में प्रत्यावेदन भेजा। मंडल कार्यालय की तरह वहां भी क्लेम का दावा खारिज हो गया। स्थायी समिति और बीमा लोकपाल के स्तर से भी प्रत्यावेदन का यही हश्र हुआ।
कंपनी में हर स्तर पर प्रयास के बाद निराश होने पर कमल ने जिला उपभोक्ता फोरम में वाद दायर किया। फोरम ने अपने फैसले में कहा है कि बीमित व्यक्ति द्वारा बीमारी छिपाने का साक्ष्य कंपनी पेश नहीं कर सकी। लिहाजा उसके नामिनी कोे बीमे का दो लाख, मानसिक क्षति का 20 हजार, वाद व्यय का 10 हजार रुपए दिया जाए। मानसिक क्षति और वाद व्यय की राशि एलआइसी के मंडल प्रबंधक हल्द्वानी, क्षेत्रीय प्रबंधक कानपुर और तत्कालीन स्थायी समिति के सदस्य अधिकारियों के वेतन से प्रतिमाह पांच-पांच हजार की कटौती करके जुटाई जाए। सेवानिवृत्त हो चुके अधिकारियों से इसकी वसूली की जाए।
जिला उपभोक्ता फोरम का कहना था कि बीमाधारक गणेश चंद्र पांडे का बीमार होना और उन्हें बीमारी की जानकारी होना दोनोें भिन्न तथ्य हैं। केवल बीमार होने के तथ्य के आधार पर उन्हें तब तक तथ्य छिपाने का दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक कि उन्हें उस बीमारी का ज्ञान पालिसी लेते वक्त न हो।