संवाद न्यूज एजेंसी
बागेश्वर। जिले में मूंगा रेशम की खेती की अपार संभावनाओं को देखते हुए असोम से आए वैज्ञानिकों के दल ने क्षेत्र का भ्रमण किया। विशेषज्ञों ने देवकी लघु वाटिका और कपकोट क्षेत्र में हो रही मूंगा रेशम की खेती और यहां तैयार हो रहे सीड का निरीक्षण किया। इसे प्रदेश के पर्यावरण संरक्षण और स्वरोजगार के लिए बेहद लाभकारी बताया।
शुक्रवार को असम से आए वैज्ञानिक डॉ. विजय एन, डॉ. पुलक राभा और डॉ. विक्रम कुमार ने कपकोट में किसानों के साथ संवाद किया। उन्होंने बताया कि मूंगा रेशम दुनिया का सबसे कीमती रेशम है, जिसे असोम का जीआई टैग प्राप्त है। उन्होंने किसानों को मूंगा रेशम की बारीकियों और इसकी वैश्विक मांग के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
वृक्ष पुरुष किशन सिंह मलड़ा ने वैज्ञानिकों को मूंगा रेशम के साथ हल्दी, कपूर कचरी, अदरक, गडेरी, लेमन ग्रास, एलोवेरा और रोजमैरी जैसी संयुक्त फसलों के उत्पादन की जानकारी दी। बताया कि असोम से लाए बीज से पैदावार बढ़ाकर अब यहीं सीड तैयार किया जा रहा है।
वैज्ञानिकों ने इस मिश्रित खेती के मॉडल की जमकर सराहना की। इसे असोम में भी अपनाने की सहमति जताई। इस मौके पर रेशम विभाग के प्रभारी निरीक्षक बृजेश रतूड़ी और निरीक्षक कमलेश कुमार मौजूद रहे।