कनलघाटी के लिए एलोवेरा की खेती मुफीद मानी जा रही है। यह सौंदर्य सामग्री समेत जीवन रक्षक दवाइयां बनाने के काम आ रही है। नान कन्यालीकोट गांव निवासी 65 वर्षीय श्याम सिंह कनौली की हाड़तोड़ मेहनत से तीन नाली भूूमि एलोवेरा से लहलहा रही है। इसके कारोबार से उन्हें साल में 50 हजार रुपये तक की आमदनी होने लगी है।
समुद्र सतह से करीब 1300 मीटर की ऊंचाई पर कनलगढ़ घाटी की दोमट मिट्टी एलोवेरा की खेती के लिए बेहतर मानी जा रही है। वर्ष 2010 में नान कन्यालीकोट गांव के श्याम सिंह ने ग्राम्या से जुड़कर एलोवेरा की खेती का काम शुरू किया।
उन्होंने इसके लिए 15 दिन का विशेष प्रशिक्षण लखनऊ और तीन दिन का प्रशिक्षण देहरादून में लिया। एलोवेरा के बीजों के रोपण के लिए खेेतों में नालीदार क्यारियां बनाई जाती हैं। गोबर भी नाली में डाली जाती है। एक बार पौध तैयार होने पर उससे छह साल साल तक फसल ली जा सकती है।
खेतों में पानी रुकने से पौध खराब हो जाते हैं। निराई, गुड़ाई के साथ पौधों में पीलापन आने पर उसमें कीटनाशक दवाइयां डाली जाती हैं। पौध तैयार होने पर इसकी शाखाएं निकलती हैं। शाखाओं को तोड़कर मशीन के जरिए जूस निकाला जाता है।
एक कुंतल एलोवेरा की शाखाओं से 50 लीटर जूस निकलता है। जूस को प्लास्टिक की बोतलों में पैक कर बेचा जाता है। पहले वह जूस बेचने भटकते थे लेकिन अब खरीदार घर पर ही आ जाते हैं। एक लीटर जूस की कीमत दो सौ रुपये है।
एलोवेरा सौंदर्य प्रसाधन समेत पेट में बनने वाली गैस, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर दूर करने का काम आता है। उन्होंने कहा कि यदि बेरोजगार एलोवेरा की खेती हाथ में लें तो उन्हें रोजगार के लिए पलायन नहीं करना पड़ेेगा।