कौसानी से करीब आठ किमी की दूूरी पर स्थित पिनाकेश्वर मंदिर से बौरारो और गेवाड़ घाटी के लोगों की गहरी आस्था रही है। मंदिर का निर्माण कुमाऊं के चंद राजवंश के महाराजाधिराज बाल बहादुर ने वर्ष 1454 में किया था। राजा को महादेव ने प्रसन्न होकर पुत्र का वरदान दिया जिसका नाम उन्होंने उदेचंद रखा।
मंदिर में नियमित पूजा पाठ, कथा भागवत पुराणों का वाचन होते रहते हैं। मंदिर में कार्तिक महीने की चतुर्दशी और पूर्णिमा पर दो दिन क्षेत्र का सुप्रसिद्ध मेला लगता है। मेले में दूर-दूर से मेलार्थी पहुंच रहे हैं। लोगों का विश्वास है कि जो भी व्यक्ति मंदिर में सच्चे मन से पहुंचता है। भोलेनाथ उसकी सभी मनोकामनाओं को पूरी कर देते हैं।
समुद्र सतह से 2700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पिनाकेश्वर मंदिर बागेश्वर और अल्मोड़ा जिले की सीमा में पड़ता है। ऊंची चोटी में बना मंदिर अत्यंत रमणीक है। धर्मशिला से मंदिर तक 365 पौराणिक सीढ़ियां बनी हैं। यहां पानी के दो कुंए भी हैैं। इन्हीं कुओं से मंदिर के कार्यों के लिए पानी लाया जाता है।
यहां से सूर्य के उदय और अस्त होने का मनोरम दृश्य दिखाई देता है जबकि हिमालय की लंबी श्रृंखला के अलावा सोमेश्वर और गेवाड़घाटी दृष्टिगोचर होती है। इस मंदिर में बागेेश्वर और अल्मोड़ा जिले के कई गांवों के लोग पूजा के लिए आते हैं। निसंतान महिलाएं कार्तिक महीने के चतुर्दशी की रात अखंड दीपक जलाती हैं।
मान्यता है कि महादेव प्रसन्न होकर उन्हें संतान सुख देतेेेे हैं। मनौती पूरी होने पर लोग मंदिर में घंटे, घड़ियाल, चांदी के छत्र अर्पित करने के अलावा लोग भंडारे का भी आयोजन करते हैं। मंदिर में पूजा पाठ की जिम्मेदारी कांटली के कांडपाल परिवारों के पास है जबकि कांटली मठ के श्री महंत नरेंद्र गिरि महाराज की देखरेख में मंदिर की व्यवस्था चलती हैं।