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सुंदरढुंगा ग्लेशियर में मौजूद देवी और नंदाकुंड

Fri, 22 Apr 2016 11:11 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला (बागेश्वर)।
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बुग्याल में चरतीं बकरियां - फोटो : अमर उजाला
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बागेश्वर। जिले के उत्तर भाग स्थित कपकोट के हिमालयी क्षेत्र को प्रकृति ने अपने अनमोल खजाने से भरा है। यहां मनोहारी हिमनदों की भरमार है। इन्हीं में से एक है सुंदरढुंगा ग्लेशियर। विशाल भू भाग में फैले में इस ग्लेशियर में पहुंचने पर तो स्वर्गानुभूति हो जाती है। इसी क्षेत्र में पवित्र देवी और नंदा कुंड हैं। कुंडों के चारों ओर ब्रह्मकमल खिलते हैं।
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इन्हीं कुंडों से श्रद्धालु जल और ब्रह्मकमल तोड़कर ले जाते हैं। ग्लेशियर पर भोर में पड़ने वाली सूरज की सुनहरी किरणें तो तन, मन को प्रफुल्लित कर देती हैं। कुदरत ने इस क्षेत्र को क्या खूब संवारा है लेकिन सरकारें हैं कि उन्होंने कुछ भी नहीं किया है। वहां रहने, खाने की व्यवस्था तो छोड़ो पैदल चलने को पगडंडी तक नहीं है। पर्यटकों को झाड़ियां पकड़कर चलना पड़ता है।

कपकोट ब्लॉक के उत्तर भाग में 3880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सुंदरढुंगा ग्लेशियर अत्यंत मनोरम है। वहां पहुंचने के लिए पर्यटकों को वाहन के जरिए जिला मुख्यालय से 38 किमी दूर सोंग और वहां से तीन किमी लोहारखेत जाना पड़ता है। इसके बाद पर्यटकों को धाकुड़ी की 11 किमी की पैदल यात्रा करके धाकुड़ी पहुंचना पड़ता है।
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दूसरे दिन पर्यटक सात किमी दूर पैदल खाती पहुंचते हैं। वहां से सात किमी पैदल जैंतोली पहुंचते हैं। 16 किमी पैदल चलकर कठेलिया पहुंचा जाता है। इससे आगे छह किमी का पैदल रास्ता अत्यंत कष्टदायक, पथरीला, कांटों से घिरा, उबड़ खाबड़ है। जहां सैलानियों को घास पकड़कर आगे बढ़ना पड़ता है।

जैंतोली में केएमवीएन का रेस्ट हाउस निर्माणाधीन है जबकि कठेलिया में केएमवीएन का 20 बेड का रेस्ट हाउस और एक पेइंग गेस्ट हाउस है। सुंदरढुंगा ग्लेशियर में रहने, खाने की कोई व्यवस्था नहीं है। कठेलिया से एक रास्ता मैकतोली और दूसरा बैलूनी ग्लेशियर को जाता है। पहले पर्यटक सुखराम गुफा में रात बिताते थे लेकिन 16 साल पहले गुफा के भीतर एक बड़ा पत्थर गिर गया।

जिससे दबकर पश्चिम बंगाल के छह पर्यटकों की मौत हो गई थी। करीब चार किमी की लंबाई में फैला सुंदरढुंगा ग्लेशियर अत्यंत सुंदर है। गर्मी का मौसम आते ही यहां रंग बिरंगे फूल खिलने शुरू हो जाते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र में कस्तूरी मृग, बारहसिंघा, घुरड़, काकड़, तेंदुए, भालू, जंगली मुर्गियां आदि जीव, जंतु दिखाई देते हैं। ग्लेशियर अत्यंत चमकदार है।

यहां पहुंचने के लिए सैलानियों को सूरज निकलने से पहले पहुंचना पड़ता है। ग्लेशियर पर पड़ने वाली सूरज की पहली किरणें ग्लेशियर की सुंदरता पर चार चांद लगाते हैं। सुबह सात बजे के बाद पहुंचने पर कोहरा छाने लगता है। इस कारण पर्यटक निराश हो जाते हैं।

इस ग्लेशियर की यात्रा मई आखिरी सप्ताह से जून के दूसरे सप्ताह तक होती है। बरसात में यहां के तेज गधेरों को पार करना मुश्किल हो जाता है। सितंबर में कुछ समय के लिए ग्लेशियर की यात्रा होती है। बाद में बर्फबारी के कारण यात्रा नहीं हो पाती।
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