जनवरी का महीना बीतने को है लेकिन बारिश और बर्फबारी का अब भी इंतजार बना है। बर्फबारी नहीं होने से हिम से लकदक रहने वाली चोटियां काली पड़ चुकी हैं। ग्लेशियरों में बर्फ कम हो रही है। 1800 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर जमीन में दरारें पड़ रही हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में फसल सूखने की कगार पर पहुंच चुकी है।
करीब 20 साल पहले तक पिंडर घाटी के खाती, जातोली, वाछम गांव दिसंबर से फरवरी तक अधिकतर समय बर्फ से ढके रहते थे। प्रसिद्ध पिंडारी ग्लेशियर को जाने वाला मार्ग द्वाली और सुंदरढूंगा का कठलिया से आगे बंद हो जाता था। पिछले कुछ वर्षों में हालात तेजी से बदले हैं। दिसंबर और जनवरी में भी बर्फ नहीं गिर रही है। पिछले चार साल से हालात अधिक खराब हो गए हैं। इस साल अक्तूबर से अब तक बारिश नहीं हुई है। हालांकि ऊंचाई वाले इलाकों में विगत तीन जनवरी को हल्की बर्फ गिरी थी।
पर्यटन कारोबार पर भी पड़ रहा असर
पर्यटन कारोबार से जुड़े टूर गाइड, होम स्टे संचालक रतन सिंह, खिलाफ सिंह, दिनेश सिंह, नंदन सिंह, वीरेंद्र सिंह, सुरेंद्र सिंह, विक्रम सिंह, राजेंद्र सिंह, देव कुमार आदि ने बताया कि बर्फबारी पर ही क्षेत्र का पर्यटन कारोबार टिका हुआ है। ग्लेशियरों में बर्फ कम होती रही तो देश-विदेश से आने वाले सैलानी यहां का रुख नहीं करेंगे। 2012 की आपदा के बाद से पहले ही कारोबार मंदा हो गया था। अब बर्फबारी कम होने से हिम चोटियों का आकर्षण घट रहा है। ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं। यही हाल रहा तो आने वाला समय ग्लेशियर और पर्यटन से जुड़े क्षेत्र के कारोबारियों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।