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सालों बाद दिखी कुम्हारों के चेहरों पर मुस्कान

Wed, 18 Oct 2017 09:45 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर।
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दोकलाम विवाद के बाद सोशल मीडिया में चीनी सामान के बहिष्कार की अपील ने इस दीवाली खासा असर दिखाया। लोगों ने घरों को सजाने के लिए बिजली की लड़ियां तो खरीदी ही मिट्टी के दिये खरीदना भी नहीं भूले। यही कारण है कि सैकड़ों किलोमीटर दूर से दिये बेचने के लिए आने वाले कुम्हारों के चेहरों पर भी वर्षों बाद मुस्कान नजर आई। दिवाली पर बिजली की सस्ती चाइनीज लड़ियां बाजार में आने से पिछले एक दशक में मिट्टी के दिये भुला दिए गए थे।
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शहर तो दूर गांव-गांव का हर घर चाइनीज माला से सजा नजर आता। 15 से 20 रुपये में मिलने वाली चाइनीज मालाओं से घर को सजा लिया तो दो-चार मोमबत्तियां जलाकर दिये जलाने की परंपरा भी निभा ली। ऐसे में सैकड़ों मील दूर से मिट्टी के दिये बेचने के लिए आने वाले कुम्हारों के चेहरे मुरझाये रहते थे। आखिरकार उन्हें बचा-खुचा सामान स्थानीय व्यापारियों को औने-पौने दामों में देना पड़ता था, लेकिन इस दिवाली कुम्हारों के चेहरों पर भी मुस्कान नजर आई।

पिछले आठ साल से मिट्टी के दिये बेचने बरेली के देवनियां गांव से यहां आने वाले विशाल प्रजापति और विकास कुमार ने बताया कि इस बार धनतेरस पर दियों की अच्छी बिक्री हुई। बताया कि गांव से नौ व्यापारी दिये बेचने के लिए बागेश्वर पहुंचे हैं। पिछले साल तक बहुत कम लोग दिये खरीदते थे। इस बार लोगों ने दियों को भी प्राथमिकता दी है। 15 से 20 रुपये दर्जन के हिसाब से दिये बिके। धनतेरस पर हर व्यापारी ने आठ से 10 हजार के दिये बेचे।
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विशाल प्रजापति ने बताया कि उसका परिवार पिछले दो दशक से दिये बेचने यहां आता है। पहले उसके पिता यहां आते थे। पिछले आठ सालों से अब वह यहां आ रहा है। कहा कि इतने सालों में पहली बार अच्छी बिक्री हुई है। पिछले एक माह से दिये बनाने के काम में लगे थे। बरेली से यहां पहुंचने में हजारों रुपये भाड़े में खर्च हो जाते हैं। काफी सामान टूट-फूट जाता है। फिर भी 35 से 40 हजार रुपये तक उन्हें मिल जाते हैं। कहा कि दीपावली का त्योहार निपटते ही कुल्हड़, गिलास और घड़े बनाने का काम शुरू कर देंगे। 
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