बागेश्वर के कमेडीदेवी स्थित संस्कृत महाविद्यालय।
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बागेश्वर। प्राचीन भाषा संस्कृत को जीवित रखने वाला जिले का एकमात्र नारायण संस्कृत महाविद्यालय कमेड़ीदेवी शासकीय उपेक्षा का दंश झेल रहा है। महाविद्यालय के भवन की हालत खस्ता हो गई है। बिजली, पानी की व्यवस्था नहीं है। महाविद्यालय में अध्ययनरत दूरस्थ क्षेत्रों के गरीब विद्यार्थी आवासीय व्यवस्था न होने से पलायन वाले पुराने घरों या किराए पर रहने को मजबूर हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर कमेड़ीदेवी में आजादी से पूर्व वर्ष 1939 में संस्कृत महाविद्यालय स्थापित किया गया था। इसको संस्कृत शिक्षा परिषद देहरादून से पूर्व मध्यमा और उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार से शास्त्री की मान्यता मिली है। यहां से पूर्व, उत्तर मध्यमा और शास्त्री की डिग्री लेकर कई विद्यार्थी रोजगार प्राप्त कर चुके हैं। पांच नाली भूमि पर बने इस महाविद्यालय का एकमात्र शौचालय जर्जर हो गया है। महाविद्यालय में पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी, गणाईगंगोली और बागेश्वर जिले के दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थी पढ़ते हैं। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को बताने के बाद भी समस्याओं का समाधान नहीं हो सका है।
एक स्थायी और दो अस्थायी शिक्षक तैनात
बागेश्वर। प्रबंधकीय व्यवस्था के तहत संचालित हो रहे महाविद्यालय की शुरू से ही अनदेखी हुई है। महाविद्यालय में एकमात्र पूर्णकालिक शिक्षक खुशाल सिंह राठौर के पास प्राचार्य का भी पदभार है। शिक्षकों के चार स्थायी पदों में से प्रबंधन ने दो शिक्षक तैनात किए हैं। लिपिक, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का पद खाली है। प्रभारी प्राचार्य भी अगले वर्ष फरवरी में सेवानिवृत्त हो जाएंगे। एक दशक पहले यहां छात्र संख्या अधिक थी लेकिन अव्यवस्थाओं के कारण वर्ष 2017 में छात्र संख्या न्यूनतम 35 रह गई थी। अब 52 है।
महाविद्यालय का निरीक्षण कर प्रबंधक समिति से बात की जाएगी। विद्यार्थियों की संख्या, कमरों की व्यवस्था और अन्य सुविधाएं देखने के बाद आगे निर्णय लिया जाएगा।
- एसबी जोशी, संयुक्त निदेशक, संस्कृत शिक्षा उत्तराखंड।