हजारों रंग समेटे हुईं तितलियां किसी भी पहाड़ी सुबह को जादुई बना देती हैं। कभी-कभी यही तितलियां प्रकृति के छिपे रहस्यों को उजागर कर इतिहास रच देती हैं। कुमाऊं–गढ़वाल की सीमा पर बसे शांत, बादलों में लिपटे ग्वालदम की वादियों में ऐसा ही दुर्लभ प्रमाण मिला है। साढ़े सात दशक के बाद एक खास तितली रत्ना फ्लैट फिर उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में दिखाई दी है।
यह रोमांचक खोज की है डिग्री कॉलेज कपकोट के सहायक प्रोफेसर दीपक कुमार ने। वह पिछले कई महीनों से ग्वालदम के जंगलों में तितलियों और पक्षियों के दस्तावेजीकरण में जुटे हैं। 9 अगस्त 2025 की सुबह उनके लिए खास उपलब्धि की तरह रही। दीपक बताते हैं कि वह चमोली जिले के ग्वालदम कस्बे में एक जलधारा के पास खड़े थे। यह जगह कुमाऊं-गढ़वाल की सीमा पर समुद्र तल से लगभग 1960 मीटर की ऊंचाई पर है। तभी एक छोटी-सी तितली नींबू बाम (मेलिसा ऑफिसिनेलिस) की पत्ती पर आकर ठहर गई। इसका रंग-रूप बिल्कुल अलग था। जैसे किसी ने हिमालय की धूप और छांव को पंखों पर सजा दिया हो। उन्होंने तुरंत कैमरा उठाया और तस्वीर ली। बाद में पहचान करने और रिकॉर्ड खंगालने पर सुखद अनुभूति हुई।
खासियत
-रत्ना फ्लैट को हेस्पीरियडे परिवार की तितली (वैज्ञानिक नाम सेलेनोरहिनस रत्ना डैफ्ने) है
-इस प्रजाति की तितलियां आमतौर पर जून से सितंबर तक हिमालयी जंगलों में 1500 से 2600 मीटर की ऊंचाई पर सक्रिय रहती हैं
-आबादी के समीपवर्ती क्षेत्रों में यह आसानी से नहीं दिखती है
76 साल बाद मिला प्रमाण
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुष्टि
ग्वालदम जैसे शांत, हरे-भरे, बादलों से ढके क्षेत्र में अरसे बाद मिली यह छोटी-सी तितली वैज्ञानिकों के लिए आशा की नई किरण है। दुर्लभ प्रजाति रत्ना फ्लैट की पहचान सुनिश्चित करने के बाद दीपक ने वैज्ञानिक रूप से इसका दस्तावेजीकरण किया। इस रिपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय शोध प्रकाशित करने वाले जनरल जर्नल ऑफ एंटोमोलॉजी एंड जूलॉजी स्टडीज ने प्रकाशित किया है। इस प्रकाशन के बाद यह आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया गया कि वर्ष 1949 के बाद उत्तराखंड में इस तितली के दिखने का यह पहला प्रमाण है।
रत्ना फ्लैट तितली को प्रदेश में देखा जाना जैव विविधता के लिए अच्छा संकेत है। नियमित तौर पर इस तरह के शोध होने पर कई अन्य दुर्लभ तितलियां भी प्रदेश में मिल सकती हैं। उम्मीद है कि इस नए शोध से कई अन्य लोग भी प्रेरित होंगे।