बागेश्वर। यहां विशेष प्रकार का कौआ देखा गया है। विशेष बात यह है कि इस कौवे की चोंच बलूचिस्तान से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक पाए जाने वाले लार्ज बिल्ड क्रो से भी बड़ी है। चोंच के आगे का भाग नुकीला और अंदर की ओर मुड़ा हुआ है। ऐसा पहली बार है जब इस क्षेत्र में इस तरह का लार्ज बिल्ड क्रो देखा गया है। इसके साधारण कौओं के साथ रहने और कौवे की चोंच के आकार को देखकर जंतु विज्ञानी भी हैरत में हैं।
नॉर्थ अमेरिका में जहां कौओं की चार प्रजातियां पाई जाती हैं, वहीं एशिया में भारत से लेकर श्रीलंका तक मुख्य रूप से दो प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें एक प्रजाति गहरे काले रंग की होती है। इनके पंख चमकदार बैंगनी रंग के होते हैं। बलूचिस्तान, श्रीलंका, अरुणाचल प्रदेश सहित दक्षिण और पूर्वी रेगिस्तान से लेकर हिमालय तक यह कौआ सामान्य रूप से पाया जाता है। आबादी से दूर रहने के कारण इसे जंगल क्रो कहा जाता है।
जबकि, दूसरी प्रजाति के कौओं की गर्दन ग्रे कलर की होती है। यह कौआ मुख्य रूप से घरों के आसपास जोड़े या झुंडों में देखे जाते हैं। इससे इनको हाउस क्रो भी कहा जाता है। ग्रे कलर वाले हाउस क्रो के साथ बागेश्वर में जो कौआ देखा गया है, वह लार्ज बिल्ड क्रो से बिल्कुल अलग है। जहां, कौवे का आकार और रंग बिल्कुल ग्रे गर्दन वाले कौओं की तरह है, वहीं उसकी चोंच उसे और कौओं से अलग कर रही है।
इस कौवे की चोंच बेहद पतली, नुकीली और अंदर को मुड़ी हुई है। यह कौआ दो तरह की आवाजें निकालता है। इस संबंध में जंतु विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. सीएस नेगी ने बताया कि साधारण कौओं के अलावा बड़ी चोंच वाला लार्ज बिल्ड क्रो होता है।
यह कौआ भी दो तरह की आवाजें निकालता है। लेकिन, इसमें कुछ भिन्नता है। साथ ही इस कौवे का दूसरी प्रजाति के कौओं के साथ देखा जाना हैरत पैदा करता है। डॉ. सीएस नेगी कहते हैं कि यह एक शोध का बढ़िया विषय है।