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फिल्म से जान सकेंगे राजुला-मालूशाही की गाथा

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बागेश्वर में राजुला मालूशाही डाक्यूमेंट्री फिल्म के दृश्यों का फिल्मांकन करते कलाकार। संवाद न? - फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। भगवान बागनाथ की धरती पर इन दिनों लोक गाथा राजुला-मालूशाही का फिल्मांकन किया जा रहा है। फिल्म का पहला दृश्य मंगलवार को बागनाथ मंदिर में शूट किया गया। बागनाथ मंदिर में राजुला मालूशाही के पिता दुलाशाह और उनकी रानी और भोट के व्यापारी के जो सुनपत शौका और उनकी पत्नी गांगुली पर दृश्य फिल्माया गया। बुधवार को बागेश्वर की कांडा रोड पर फिल्म के दृश्य फिल्माए गए। फिल्म का निर्देशन कांता प्रसाद कर रहे हैं।
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फिल्म में राजा दुलाशाह की भूमिका हरिकृष्ण भट्ट, रानी की भूमिका सुनीता नेगी, सुनपत शौका का किरदार नीरज कांत और उनकी पत्नी का किरदार अरुणिमा रावत निभा रही हैं। फिल्म के निर्देशक कांता प्रसाद ने बताया कि फिल्म संस्कृति विभाग के लिए बनाई जा रही है। पर्यावरण एवं ग्रामीण जन विकास एक पहल इसका निर्माण कर रही है। राजुला मालूशाही का फिल्मांकन उत्तराखंड के बेहतरीन कैमरामैन गोविंद सिंह बिष्ट कर रहे हैं। सह कलाकार आरपी कांडपाल, विक्रम सिंह आदि हैं। फिल्मांकन में केशव भट्ट, मनोज लोहनी ने सहयोग दिया। शूटिंग के दौरान प्रवेंद्र सिंह नेगी थे।
बागनाथ धाम से रहा है बैराठ के राजा का ताल्लुक
बागेश्वर। राजुला-मालूशाही लोकगाथा कुमाऊं के पहले राजवंश कत्यूर के वंशजों की कहानी है। उस समय कत्यूरों की राजधानी बैराठ (चौखुटिया) में थी। बैराठ के राजा दुलाशाह की कोई संतान नहीं थी। उन्हें किसी ने बताया कि बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करें तो उन्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है। वह बागनाथ के मंदिर आए। यहां उनकी मुलाकात भोट के व्यापारी सुनपत शौका और उसकी पत्नी गांगुली से हुई। वह भी संतान की चाह में आए थे। दोनों ने आपस में समझौता किया अगर उनकी संतानें लड़का और लड़की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगे।
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भगवान बागनाथ की कृपा से बैराठ के राजा का पुत्र हुआ, उसका नाम मालूशाही रखा गया। सुनपत शौका के घर में लड़की पैदा हुई, उसका नाम राजुला रखा गया। इस बीच ज्योतिषी ने राजा दुलाशाह को बताया कि मालूशाही का अल्प मृत्यु का योग है। इसका निवारण करने के लिए जन्म के पांचवें दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से करना होगा। राजा ने अपने पुरोहित को शौका देश भेजा और सुनपति शौका से कन्या राजुला से मालूशाही का ब्याह करने की बात की। सुनपति तैयार हो गए और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया। इसी बीच राजा दुलाशाही की मृत्यु हो गई। इस अवसर का फायदा दरबारियों ने उठाया और यह प्रचार कर दिया कि जो बालिका मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, अगर वह इस राज्य में आएगी तो अनर्थ हो जाएगा। इसलिए मालूशाही से यह बात गुप्त रखी जाए।
समय बीतता गया। बैराठ में मालू बचपन से जवानी में कदम रखने लगा वहीं भोट में राजुला का सौंदर्य लोगों में चर्चा का विषय बन गया। राजुला का विवाह विक्खी पाल नामक व्यक्ति से हो जाता है। वह राजुला से विवाह करना चाहता है। विक्खी पाल खीर में जहर देकर मालूशाही को मार देता है। राजुला की मां अपने भाई राजा मृत्यु सिंह को सिदुवा-विदुवा रमौल और बाबा गोरखनाथ के साथ हूण देश भेजतीं हैं। मालूशाही को जीवित किया जाता है। तमाम उतार-चढ़ाव के बाद राजुला और मालूशाही का विवाह हो जाता है। यह लोकगाथा उत्तराखंड में बहुत ही प्रचलित है।
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