इस बार मौसम की बेरुखी ने मैदान के साथ ही पहाड़ को भी तपा दिया है। नमी की कमी के चलते बारिश नहीं होने से हालात दिनों-दिन बिगड़ते जा रहे हैं। मौसम की गंभीर स्थिति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जिले में पिछले छह माह में वर्षा का औसत महज 85 एमएम रहा है।
मौसम विज्ञानियों के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण पिछले एक दशक में मौसम में बड़ा बदलाव आया है। इस बदलाव के चलते कभी प्री-मानसून में ही सामान्य से अधिक वर्षा हो रही है, तो कभी मानसून पीरियड में भी औसत बारिश नहीं हो रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में पहले प्री-मानसून वर्षा राहत देती थी। लेकिन, इस वर्ष नमी की कमी के कारण प्री-मानसून वर्षा न के बराबर ही हुई है।
जिले में जहां जनवरी 2015 में मार्च और अप्रैल में प्री-मानसून वर्षा का औसत 173 एमएम था, वहीं वर्ष 2016 में मार्च और अप्रैल में लगभग 70 एमएम बारिश ही हुई। पिछले वर्ष की तुलना में यह बारिश 103 एमएम कम है। छह माह से पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण स्रोतों का पानी लगातार कम हो रहा है।
सितंबर में ही बेस लेबल पर पहुंच चुकी नदियों का जलस्तर भी लगातार घट रहा है। बारिश नहीं होने से जहां फसलें खेतों में ही सूखकर बरबाद हो गई, वहीं जंगलों की आग और धुंध की समस्या ने विकराल रूप ले लिया है। यदि शीघ्र बारिश नहीं हुई तो पहाड़ में धुंध की समस्या अभी और बढ़ेगी।
इस साल हुई बारिश पर एक नजर
नवंबर 2015 - शून्य
दिसंबर 2015 - शून्य
जनवरी 2016 - शून्य
फरवरी 2016 - 15 एमएम
मार्च 2016 - 60 एमएम
अप्रैल 2016 - 10 एमएम
कुल योग - 85 एमएम
वातावरण में नमी की कमी के कारण प्री-मानसून बारिश में कमी आई है। बारिश नहीं होने से इस समय तापमान सामान्य से चार से पांच डिग्री अधिक डिग्री चल रहा है। पश्चिमी विक्षोभ बन रहा है। दो-तीन दिन के भीतर बारिश के आसार हैं। वर्षा के बाद तापमान में गिरावट आएगी।
- डॉ. आनंद शर्मा, पूर्व निदेशक, उत्तराखंड मौसम विभाग।