बागेश्वर। बागेश्वर नगर की पेयजल व्यवस्था दम तोड़ती योजनाओं के भरोसे चल रही है। कुछ योजनाएं 20 तो कुछ 40 साल पुरानी हो चुकी हैं। जिला बनने के 25 साल पूरे होने के बावजूद नगरपालिका क्षेत्र में रहने वालों को जरूरत के अनुसार पीने का पानी नहीं मिल रहा है।
एक पेयजल योजना का निर्माण 20 से 25 साल की अवधि के लिए किया जाता है। इस दौरान आबादी में बढ़ोतरी होती है और योजना के पाइप भी जर्जर होने लगते हैं। अवधि पूरी करने केे बाद पेयजल योजना को पुनर्गठन की जरूरत होती है। जिला मुख्यालय की पुरानी और सबसे बड़ी जखेड़ा पेयजल योजना का निर्माण वर्ष 1982 में हुआ था। 41 साल पूरी कर चुकी इस योजना से अब भी कठायतबाड़ा, ठाकुरद्वारा, स्टेशन मार्ग और अड़ौली तक पेयजल आपूर्ति होती है। अधिकांश समय योजना की पाइप लाइन में रिसाव होने से लोगों को पेयजल संकट का सामना करना पड़ता है।
1979 में बनी बिलौना पेयजल योजना, 1985 में बनी थापली पेयजल योजना, 1987 में बनी मंडलसेरा पेयजल योजना भी अपनी अवधि पूरी कर चुकी हैं। वर्ष 2003 में बनी अमसरकोट पेयजल योजना और 2004 में पुनर्गठित कठायतबाड़ा पेयजल योजना अपनी अवधि के अंतिम दौर में हैं। 2016 में बनी नगरीय आईवैल योजना ही एकमात्र ऐसी योजना है जिसे नई योजनाओं में गिना जा सकता है।
इनसेट
जरूरत 5.52 एमएलडी की, मिल रहा 3.02 एमएलडी पानी बागेश्वर। जल संस्थान से मिली जानकारी के अनुसार नगर के 11 वार्डों में रोजाना 5.52 एमएलडी पानी की जरूरत होती है। इसके सापेक्ष 3.02 एमएलडी ही पानी मिल रहा है। सबसे अधिक पेयजल संकट मंडलसेरा उत्तरी और दक्षिणी वार्ड में है। दोनों वार्डों में रोजाना 1.22 एमएलडी पानी की जरूरत पड़ती है जिसके सापेक्ष लोगों को केवल .28 एमएलडी पानी मिल रहा है। ज्वालादेवी वार्ड में .41 एमएलडी मांग के सापेक्ष .10 एमएलडी पानी की ही आपूर्ति हो रही है।
नगर की अधिकतर योजनाएं पुरानी हो चुकी हैं। इन योजनाओं को तत्कालीन आबादी के अनुसार डिजाइन किया गया था। गर्मी के दिनों में स्रोतों में जलस्तर कम होने पर परेशानी अधिक हो जाती है। लंबे समय से निर्माणाधीन मंडलसेरा पंपिंग योजना के निर्माण पर ही नगर का पेयजल संकट दूर होने की उम्मीद टिकी है।
सीएस देवड़ी, ईई जल संस्थान बागेश्वर।