बागेश्वर। वनाग्नि काल चरम पर है। जिले में भी जंगलों के जलने की रफ्तार में तेजी आ रही है। वन विभाग के कर्मचारी लगातार वनों को बचाने के प्रयास कर रहे हैं, लेकिन मानव संसाधन कम होने का खामियाजा विभाग को उठाना पड़ रहा है। जिले के 1,12,536 हेक्टेयर वन क्षेत्र को बचाने की जिम्मेदारी मात्र 284 अधिकारी-कर्मचारी और फायर वॉचरों पर है। फायर सीजन में डीएफओ का पद भी खाली है।
जिले में 66,236 हेक्टेयर आरक्षित वन, 35,300 हेक्टेयर वन पंचायत और 11,000 हेक्टेयर सिविल वन है। विभाग में कर्मचारियों के स्वीकृत पदों के सापेक्ष 20 कर्मचारियों के पद रिक्त हैं। अल्मोड़ा के डीएफओ के पास बागेश्वर जिले की भी जिम्मेदारी है। वर्तमान में एक एसडीओ, छह रेंजर, आठ डिप्टी रेंजर, 55 वन दरोगा, 57 वन रक्षक, 38 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और 120 फायर वॉचरों पर वनों को आग से बचाने की जिम्मेदारी है। वनाग्नि सुरक्षा के लिए सभी छह रेंज में 30 क्रू स्टेशन बनाए गए हैं। जौलकांडे में एक मास्टर क्रू स्टेशन बना है। जहां चौबीस घंटे कर्मचारी आग बुझाने के संसाधनों के साथ उपस्थित रहते हैं।
ड्रोन और ब्लोअर भी उपलब्ध
बागेश्वर। वनाग्नि नियंत्रण और रोकथाम के लिए वन विभाग के पास एक ड्रोन, 12 ब्लोअर, 780 रैक और 215 हेलमेट हैं। हालांकि पहाड़ों में संसाधनों की बजाय मानव संसाधन की अधिक जरूरत पड़ती है, जिसकी विभाग के पास कमी है।
एसडीओ वन विभाग, बागेश्वर, सुनील कुमार ने बताया कि उपलब्ध कार्मिकों और फायर वॉचरों की मदद से वनाग्नि नियंत्रण और रोकथाम कार्य चल रहा है। सभी कार्मिक जिम्मेदारी से जंगलों को बचाने में जुटे हैं। जरूरत पड़ने पर फॉयर वॉचरों की संख्या बढ़ाई जाएगी। वनाग्नि सुरक्षा के लिए वन पंचायत सरपंच और ग्रामीणों की मदद भी ली जा रही है।