बागेश्वर। जिला अस्पताल बागेश्वर में नवजात बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई खास सुविधा नहीं है। अगर मासूम की हालत बिगड़ती हो तो उसे हायर सेंटर रेफर किया जाता है। अस्पताल में कई मशीनों का अभाव है। सुविधाओं के अभाव में पिछले साल जिले के 31 नवजात बच्चों की जान चली गई थी। अस्पताल के वार्डों की स्थिति भी दयनीय है।?बेड जंग खा चुके हैं। सफाई भी राम भरोसे है। बागेश्वर में दो साल से खुशियों की सवारी का संचालन एक साल से बंद है। वहीं अल्मोड़ा में बाल रोग विशेषज्ञ का तबादला होने से बच्चों के वार्ड में ताला लटका है। संवाद
जिला अस्पताल में नहीं हैं ये मशीनें
जिला अस्पताल बागेश्वर के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीष पंत ने बताया कि अस्पताल में सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट (एसएनबीसीयू), कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर (सीपीएपी), आईसीयू, वेंटिलेटर सुविधा नहीं है। एसएनबीसीयू के माध्यम से बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है। एनेस्थीसिया न होने के कारण मेजर ऑपरेशन भी नहीं हो पा रहे हैं।
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बेडों के खस्ता हाल
बागेश्वर। जिला अस्पताल में एक गर्भवती महिला वार्ड है। इसमें छह बेड लगे हैं। इनमें से कई बेडों पर जंग लगी है। कुछ बेड सोने लायक तक नहीं है। संवाद
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वार्ड की नहीं हो रही ठीक से सफाई
बागेश्वर। वार्ड में नियमित रूप से सफाई न होने से मकड़ी के जाले लगे हैं। शौचालय की स्थिति बदहाल है। वार्ड में जहां-तहां कूड़ा फैला है। इससे बच्चे और मां दोनो के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। संवाद
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ठंड के बचने के खास उपाय नहीं
बागेश्वर। वार्ड में ठंड से बचने के लिए वार्ड में कुछ में खास इंतजाम नहीं किए गए हैं। कुछ पुराने कंबल और एक अधजले रूम हीटर के सहारे गर्भवती महिलाओं की रात कट रही है। वहीं खिड़कियों के शीशे टूटे होने से ठंडी हवाएं कमरे में सता रही हैं। संवाद
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वार्ड में बिस्तर तो है लेकिन देखने को डॉक्टर नहीं
अल्मोड़ा। जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ का तबादला होने के बाद पिछले 15 दिन से अस्पताल में एक भी बच्चा भर्ती नहीं हुआ है। अस्पताल के बच्चा वार्ड में ताला लटका हुआ है। बच्चों को अस्पताल दिखाने पहुंच रहे मरीजों को महिला अस्पताल की ओर दौड़ लगानी पड़ रही है।
इन दिनों बच्चों को निमोनिया, टाइफाइड के अलावा पेट संबंधी और अन्य दिक्कतें होती हैं, लेकिन जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ के अवकाश में होने और बीते दिनों उनका स्थानांतरण होने के बाद अस्पताल में बच्चों को देखने के लिए कोई डाक्टर मौजूद नहीं है। अस्पताल में आठ बिस्तरों का बच्चा वार्ड तो है लेकिन डाक्टर नहीं होने के कारण वार्ड में ताला लटका है।
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हालत गंभीर हो तो हल्द्वानी जाना पड़ेगा
अल्मोड़ा। अगर किसी बच्चे को कोई गंभीर बिमारी हुई तो जिला मुख्यालय में इलाज की सुविधा नहीं है। गंभीर हालत में बीमार बच्चों को यहां से 100 किमी दूर हल्द्वानी रेफर कर दिया जाता है। हालांकि ऐसी अवस्था में बच्चों को घर से अस्पताल लाने और छोड़ने के लिए जिले खुशियों की सवारी के चार वाहन हैं। इनमें एक महिला अस्पताल अल्मोड़ा, रानीखेत, चौखुटिया और धौलादेवी शामिल हैं। जबकि सरकारी पांच एंबुलेंस भी कार्यरत हैं। इनमें एक जिला अस्पताल, बेस अस्पताल, चौखुटिया, द्वाराहाट और भिकियासैंण में तैनात है।