मियावाकी पद्धति से पौधों का रोपण करते वन कर्मी
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रानीखेत में जापानी मियावाकी पद्धति से प्राकृतिक वन विकसित किए जाएंगे। अनुसंधान वन क्षेत्र कालिका ने द्वारसों के जंगल से इसकी शुरुआत कर दी है। इस विधि से कम समय से बेहतरीन प्राकृतिक वनों को विकसित करने की योजना है। शुरुआती चरण में औषधीय प्रजाति और जल संचय प्रजाति के वनों को विकसित किया जा रहा है। जिस क्षेत्र में यह वन विकसित होंगे, वहां खरपतवार को हटाकर निर्धारित मात्रा में भूसा और कंपोस्ट का मिश्रण तैयार कर वहां पौधों का रोपण किया जाएगा।
अनुसंधान वन क्षेत्र कालिका की तरफ से द्वारसौं के कंपाट संख्या 17 में मियावाकी पद्धति से प्राकृतिक वन तैयार किए जा रहे हैं। फिलहाल इस पद्धति से 0.20 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण का कार्य चल रहा है। बताया जा रहा है कि मियावाकी पद्धति से कम समय में बेहतरीन प्राकृतिक वन विकसित किए जा सकते हैं। इसके लिए चयनित क्षेत्र की खरपतवार को अच्छी तरह से साफ किया जाता है। पौध रोपण के लिए एक फुट गहरा गड्ढा बनाकर उसमें निर्धारित मात्रा में भूसा और कंपोस्ट का मिश्रण बनाया जाता है। खास बात यह है कि गड्ढे पहले से तैयार नहीं किए जाते हैं। जब पौधों का रोपण किया जाता है, उसी समय गड्ढे भी तैयार किए जाते हैं। पौधों के रोपण के लिए दो फुट की दूरी निर्धारित की गई है। इसके तहत बड़े वृक्ष, उप वृक्ष और झाड़ीनुमा प्रजाति के पौधों का रोपण किया जा रहा है। वन क्षेत्राधिकारी आशुुतोष जोशी ने बताया कि पौध रोपण में विशेष तरह का सामंजस्य बैठाया जाता है, जो भी पौध तैयार होंगे वह स्वस्थ्य रहते हैं। पौधों के संरक्षण के लिए रोपण के बाद वहां पुआल बिछा दी जाती है। अनुसंधान क्षेत्र में यह कार्य अब अंतिम चरण में है। इसके लिए वन क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित किया गया है। तीन पैच बनाए गए हैं प्रत्येक पैच में 1120 पौध लगाए गए हैं। कहा कि प्रत्येक पैच में प्रजातियों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाएगा।
क्या है मियावाकी पद्धति
मियावाकी पद्धति जापान के डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा तैयार की गई है। उनके द्वारा इस पद्धति से विश्व के कई देशों में 40 लाख से भी अधिक पौधों का प्राकृतिक रूप से उत्पादन किया गया है। इस पद्धति से कम समय से बेहतरीन प्राकृतिक वन विकसित किए जाते हैं।