बागेश्वर। उस दिन बड़ा भाई स्कूल से घर आया तो साथ में एक तिरंगा झंडा भी था। घर आते ही उसने एक लंबी लकड़ी पर तिरंगा बांधा और उसे घर के आंगन में फहराने लगा। कौतूहलवश मैंने उसके बारे में जानना चाहा तो भाई ने बताया कि यह हमारे देश का झंडा है। स्कूल में गुरुजी बता रहे थे कि अब हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो गया है। अब हम आजाद हैं और शान से तिरंगा फहरा सकते हैं। तिरंगे और देश के प्रति उसी दिन मन में सम्मान पैदा हो गया था, जो आगे चलकर देश सेवा का माध्यम बन गया। यह कहना है कि हथरसिया गांव के 83 वर्षीय पूर्व अर्धसैनिक बल के जवान चंद्रशेखर पांडेय का।
सैनिक चंद्रशेखर पांडेय ने बताया कि जब देश आजाद हुआ, तब उनकी उम्र करीब नौ साल थी। उस समय सुविधाओं और संसाधनों का अभाव हुआ करता था। पढ़ाई के लिए भी 20 से 30 किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती थी। देश की आजादी के कुछ दिन बाद ही क्षेत्र के लोगों को इसकी खबर लगी। जिस दिन स्वतंत्र होने की बात पता चली, उस दिन के बाद कई दिनों तक खुशी और उल्लास का माहौल रहा।
लोगों को उम्मीद जगी कि अब उन्हें भी अपनी इच्छानुसार जीवन जीने को मिलेगा। देश की सरकार सुविधाएं देगी। शिक्षा, सड़क, रोजगार के मौके बनेंगे। हालांकि आजादी के बाद जिस गति से विकास की उम्मीद थी, वह गति नहीं दिखी। आज भी हम मूलभूत सुविधाओं को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, जो चिंतनीय है। सरकारी कामकाज में जो चुस्ती होनी चाहिए थी, वह दिखती नहीं है।
एसएसबी में दी सेवा
सैनिक पांडेय ने वर्ष 1962 से 1996 तक तक एसएसबी में सेवा दी। सेवानिवृत होने के बाद घर आकर उन्होंने समाजसेवा का मार्ग चुना। बढ़ती उम्र के बावजूद उनका जोश और उत्साह कम नहीं हुआ है। उनका कहना है कि सिस्टम को अगर सही करना है तो आवाज उठानी पड़ेगी। जब हम अपने अधिकार के लिए लडेंगे, अपने आसपास की बुराइयों को दूर करने के लिए स्वयं आगे आएंगे तभी आजादी का महत्व है।