कपकोट के सुरकाली गांव में परिजनों और संस्था के लोगों के साथ दिनेश। विज्ञप्ति
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बागेश्वर। परिवार से बिछड़ने का गम और फिर पुनर्मिलन की खुशी क्या होती है यह दिनेश और उनके परिवार से बेहतर कौन जान सकता है। सुरकाली गांव निवासी दिनेश गिरि 15 साल की उम्र में घर से चले गए थे। तबसे उनका कोई सुराग नहीं था। श्रद्धा रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन मुंबई की मदद से उनकी 11 जनवरी को घर वापसी हुई तो परिजनों की आंखें नम हो गईं। 30 साल बाद घर लौटे दिनेश भी परिजनों को देखकर भावुक नजर आए।
दिनेश जून 2021 में मनोरोगियों के लिए काम करने वाली एक संस्था को महाराष्ट्र के अहमदनगर में मिले थे। मानसिक रूप से अस्वस्थ दिनेश जब ठीक हुए तो मंगलवार को श्रद्धा रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन से जुड़े बरेली के मनोवैज्ञानिक शैलेश कुमार शर्मा और अर्पिता सक्सेना उन्हें लेकर सुरकाली पहुंचे तो किसी को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ। 15 साल का किशोर अब 45 वर्ष का अधेड़ नजर आ रहा है। हालांकि मां-बाप की आंखें तो अपने बच्चों को हर उम्र में पहचान लेती है। यही हुआ दिनेश के पिता गोविंद गिरी, मां जानकी देवी का खुशी का ठिकाना नहीं रहा। भाई भूपेंद्र भी अपने बिछड़े हुए भाई को सामने देखकर खुशी से फूला नहीं समाया। मां जानकी देवी दिनेश से लिपटकर रोने लगीं। दिनेश की आंखों में भी आंसू छलक आए। दिनेश को देखने के लिए गांव के लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। परिजनों ने सभी का आभार जताया है।
ऐसे हुई घर वापसी की राह आसान
बागेश्वर। मनोवैज्ञानिक शैलेश कुमार शर्मा ने बताया कि स्नेह मनोयात्री पुनर्वसन केंद्र अहमदनगर की टीम ने 19 जून 2021 को दिनेश को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के राहता में पकड़ा था। वे सड़क पर बदहवास हालत में मिले थे। मानसिक रूप से बीमार थे। मनोचिकित्सक डॉ. नीरज करंदीकर की देखरेख में दिनेश का इलाज हुआ। उसके बाद दिनेश को अपना घर आश्रम दिल्ली शिफ्ट किया गया। वहां श्रद्धा रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन के ट्रस्टी और रैमन मैग्सेसे अवार्डी डॉ. भरत वाटवानी की देखरेख में दिनेश का इलाज हुआ। सोशल वर्कर नितिन, मुकुल ने दिनेश की काउंसलिंग की। स्वस्थ होने पर दिनेश ने अपना नाम-पता बताया। शैलेश ने बताया कि उनकी संस्था ने दिनेश का निशुल्क इलाज कराया। संवाद
सड़कों पर भटकने वालों के लिए काम करती है संस्था
बागेश्वर। शैलेश शर्मा ने बताया कि श्रद्धा रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन मुंबई की सड़कों पर भटकने वाले लावारिस व्यक्तियों के लिए काम करती है। कहते हैं कि सड़कों पर भटकने वाले मानसिक बीमार लोगों के मदद के लिए समाज को आगे बढ़कर मदद करनी चाहिए, ताकि समाज से तिरस्कृत इन लोगों को उनके अधिकार और समाज में सम्मान मिल सके।