कपकोट ब्लाक के कफलानी गांव निवासी मादो सिंह कुमल्टा के अखरोटों की खुशबू अब चंडीगढ़ तक पहुंचने लगी है। उनके बगीचे में लगाए गए सेब के दो सौ और तेजपत्ते के सौ पेड़ भी बड़े होने लगे हैं। मादो सिंह का यह संघर्ष रोजगार के लिए पहाड़ से पलायन कर रहे लोगों को आइना दिखा रहा है।
कफलानी गांव के मादो सिंह से सिर से पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। पिता के असमय जाने के बाद घर की जिम्मेदारी उनकी मां बलपा देवी पर आ गई थी। मादो सिंह साक्षर हैं जबकि उनके छोटे भाई राय सिंह रिटायर्ड हवलदार। मादो सिंह बताते हैं कि घर के आंगन में उनके पिता ने एक और मां ने अखरोट के दो पेड़ रोपे थे। इनमें फल आने पर उनसे सीजन में दस से 30 हजार रुपये तक आय होने लगी। अखरोट की खेती की अच्छी संभावना को देखते हुए उन्होंने उद्यान विभाग से संपर्क कर अखरोट के पांच सौ पेड़ मंगाए।
उन्होंने दोनों भाईयों की 300 नाली जमीन इन पेड़ों को लगा दिया। जो अब काफी बड़े हो गए हैं। अखरोटों की बिक्री से उनकी अच्छी खासी आय होने लगी है। बताते हैं अखरोट का एक दाना दो रुपये में बिक रहा है। अल्मोड़ा, हल्द्वानी, देहरादून, बलिया, ललितपुर, गोरखपुर, चंडीगढ़, अंबाला से लोग उनसे अखरोट मंगाते हैं।
उद्यान विभाग के सहयोग से सेब के दो सौ और तेज पत्ते के सौ पौधे रोपे हैं। सेब के पौधों में जल्दी फल लगने शुरू हो जाएंगे। उन्होंने बताया कि खेतों में बर्षाकाल में होने वाली सब्जियों के अलावा आलू, लहसुन, धनिया,प्याज, ककड़ी और मूली भी खूब होती है। अखरोट, सब्जी और पशुपालन से उन्हें साल में दो लाख रुपये से अधिक की आय हो रही है। गांव के सड़क से जुड़ने पर सभी को फायदा होगा।
पिता की तरह ही बच्चे भी हैं मेहनती
बागेश्वर। मादो सिंह कुमल्टा के बच्चे भी उन्हीं की तरह मेहनती हैं। बड़ा बेटा टीका सिंह राउमावि लीली और छोटा बेटा दयाल कुमल्टा राइंका नाचती में सहायक अध्यापक हैं। बड़ी बहू एमएससी बीएड के बाद संविदा शिक्षक जबकि छोटी बहू एमए बीएड करने के बाद सामाजिक गतिविधियों को आगे बढ़ा रही हैं।