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ऊनी कारोबार पर पड़ी नोटबंदी की मार

Sun, 15 Jan 2017 11:54 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो बागेश्वर
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बागेश्वर मेले में खाली बैठा ऊनी हस्तशिल्प का एक कारोबारी।  - फोटो : अमर उजाला
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नोटबंदी का असर इस बार कुमाऊं के ऐतिहासिक धार्मिक और व्यापारिक उत्तरायणी मेले में भी दिख रहा है। मेले में भले ही भारी भीड़ जुट रही हो लेकिन कैश की कमी के कारण खरीदारों की संख्या में काफी कमी आई है। ऊनी कपड़ों के व्यापारी नोटबंदी की सबसे अधिक मार झेल रहे हैं। इससे हस्तशिल्प के अधिकांश कारोबारियों में मायूसी छाई है। 


बागेश्वर का उत्तरायणी मेला धार्मिक और ऐतिहासिक के साथ ही व्यापारिक महत्व का भी है। करीब एक सप्ताह तक आयोजित होने वाले इस मेले में करोड़ों का कारोबार होता है। इसमें ऊनी हस्तशिल्प की सबसे अधिक बिक्री होती है। पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी, धारचूला के ऊनी व्यापारी हिमालयी भेड़ों के ऊन से निर्मित दन, चुटका, पश्मीना, पंखी, शॉल, मफलर, दस्ताने, स्कार्फ, स्वेटर, कोट आदि के खरीदार बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। शुद्ध ऊन से बने इन कपड़ों की विशेषता यह रहती है कि यह कपड़े कड़ाके की ठंड में भी गर्मी प्रदान करते हैं।
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जाड़ों में पश्मीना, चुटके और पंखी की लोग काफी खरीदारी करते हैं। इसकी कीमत पांच हजार से लेकर 18 हजार रुपए तक है। शुद्ध ऊन के मफलर और शाल की भी खूब बिक्री होती है। पंखी पांच सौ से लेकर एक हजार रुपए, दन एक हजार से लेकर 13 हजार रुपए कीमत के होते हैं। थुलमा पांच सौ रुपए से अधिक के दामों में बिकता है। व्यापारियों की मानें तो परंतु इस बार नोटबंदी के कारण हस्तशिल्प का बाजार थोड़ा नरम है। पिथौरागढ़ से आए ऊनी हस्तशिल्प के व्यापारी भगवान सिंह सोनाल ने बताया कि इस बार हस्तशिल्प का बाजार कुछ मंदा है।
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दन, कालीन और चुटके लेकर मेले में आए ऊनी हस्तशिल्प कारोबारी बची राम और कालू राम ने बताया कि तीन दिन हो गए लेकिन अभी तक बहुत कम खरीदार दुकान में आए हैं। कई ग्राहक कीमत पूछने के बाद लौट रहे हैं। उन्होंने बताया कि यदि ऐसा ही रहा तो उन्हें सामान के साथ ही लौटना पड़ेगा। 


 
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