बागेश्वर। राजस्व विभाग की लापरवाही और जल्दबाजी के कारण कपकोट के फरसाली में एक ग्रामीण को सरकारी जमीन से बेदखल करने की प्रशासनिक कार्रवाई पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश पंकज तोमर की अदालत ने रोक लगा दी है। विहित प्राधिकारी/एसडीएम कपकोट की ओर से जारी बेदखली आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि राजस्व अधिकारियों ने भूमि नापजोख के नियमों को दरकिनार किया और नोटिस में यह तक स्पष्ट नहीं दर्शाया कि कथित अतिक्रमण किस तारीख को हुआ था।
कपकोट तहसील के फरसाली वल्ली निवासी बहादुर सिंह (36) पुत्र पदम सिंह पर पटवारी ने आरोप लगाया था कि उन्होंने सरकारी खाता संख्या 62 (श्रेणी 9-3ग) की 19.95 वर्गमीटर जमीन पर अनधिकृत कब्जा कर मकान बना लिया है।
पटवारी की चालानी रिपोर्ट के आधार पर विहित प्राधिकारी कपकोट की अदालत ने 29 अगस्त 2024 को बहादुर सिंह को बेदखल करने और 24 लाख रुपये मूल्य की जमीन से अवैध कब्जा हटाने का फैसला सुनाया था। इस फैसले को बहादुर सिंह ने जिला जज की अदालत में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान जिला जज पंकज तोमर ने पत्रावली और गवाहों के बयानों का बारीकी से परीक्षण किया जिसमें प्रशासन की बड़ी कमियां उजागर हुईं। उत्तराखंड हाईकोर्ट की नजीर का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि धारा 4(1) के तहत जारी नोटिस में स्पष्ट होना चाहिए था कि अतिक्रमण किस तारीख को हुआ। बिना समय और तिथि के जारी अस्पष्ट नोटिस कानूनन शुरुआत से ही शून्य होता है। पटवारी और तत्कालीन कार्यवाहक तहसीलदार अदालत में यह साबित नहीं कर पाए कि जमीन की नाप कैसे हुई।
नियमानुसार सर्वे के लिए कम से कम दो स्थिर बिंदु होने चाहिए, जबकि पटवारी ने केवल एक बिंदु से ही नापजोख कर डाली। गवाह बने अधिकारी तो मौके के नक्शे में खेत का नंबर तक नहीं दर्शा पाए।
अदालत का अंतिम आदेश
जिला जज पंकज तोमर ने माना कि प्रशासनिक टीम ने ठोस साक्ष्य और नियमानुसार सर्वे किए बिना ही बेदखली का आदेश जारी कर दिया था। अदालत ने कपकोट विहित प्राधिकारी के बेदखली आदेश को निरस्त करते हुए अपीलार्थी बहादुर सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार को यह छूट दी है कि यदि वह चाहे तो कानून के तहत स्पष्ट कारण बताते हुए नया नियमानुसार नोटिस जारी कर पुनः कार्रवाई कर सकती है।