कपकोट ब्लाक के उत्तर भाग में स्थित विश्व प्रसिद्ध सुंदरढुंगा ग्लेशियर की यात्रा साहसिक तो है ही, लेकिन इसमें रोमांच भी भरा हुआ है। ग्लेशियर पर सुबह पड़ने वाली सूरज की किरणें पर्यटकों को बरबस अपनी ओर खींचती हैं।
कुदरत ने इस क्षेत्र को काफी कुछ दिया है, लेकिन सरकारों ने उन्हें संवारने के लिए आज तक कुछ भी नहीं किया है। वहां रहने, खाने की व्यवस्था तो छोड़ो पगडंडी तक नहीं बनाई गई है।
कपकोट ब्लाक के उत्तर भाग में 3880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सुंदरढुंगा ग्लेशियर मनोहारी स्थल है। यहां पहुंचने के लिए पर्यटकों को वाहन के जरिए जिला मुख्यालय से 38 किमी दूर सोंग, वहां से तीन किमी लोहारखेत जाना पड़ता है। इसके बाद पर्यटकों को 11 किमी की पैदल यात्रा करके धाकुड़ी पहुंचना पड़ता है।
वहां से दूसरे दिन सात किमी दूर खाती और वहां से सात किमी पैदल जैंतोली पहुंचते हैं। यहां से 16 किमी पैदल चलकर कठेलिया पहुंचा जाता है। इससे आगे छह किमी का पैदल रास्ता पथरीला, कांटोें से घिरा और उबड़-खाबड़ है। अनेकों जगह सैलानियों को घास पकड़कर आगे बढ़ना पड़ता है।
जैतोली में केएमवीएन का रेस्ट हाउस निर्माणाधीन है जबकि कठेलिया में केएमवीएन का 20 बेड का रेस्ट हाउस और एक पेइंग गेस्ट हाउस है। सुंदरढुंगा ग्लेशियर में रहने और खाने की कोई व्यवस्था नहीं है। कठेलिया से एक रास्ता मैकतोली और दूसरा बैलूनी ग्लेशियर को जाता है।
पहले पर्यटक सुखराम गुफा में रात बिताते थे 15 बरस पहले गुफा के भीतर एक बड़ा सा पत्थर गिर गया जिससे पश्चिम बंगाल के छह पर्यटकों के दबने से मौत हो गई थी। करीब चार किमी की लंबाई में फैला सुंदरढुंगा ग्लेशियर अत्यंत सुंदर है। गर्मी का मौसम आते ही यहां रंग-बिरंगे फूल खिलने शुरू हो जाते हैं।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में कस्तूरी मृग, बारासिंघा, घुरल, काकड़, तेंदुए, भालू, जंगली मुर्गियां समेत अनेक जानवर दिखाई देते हैं। ग्लेशियर पर पड़ने वाली सूरज की पहली किरणें ग्लेशियर की सुंदरता पर चार चांद लगाती हैं। सुबह सात बजे के बाद पहुंचने पर कोहरा छाने लगता है इस कारण पर्यटक ग्ल्शियर की आभा नहीं देख पाते है।
इस ग्लेशियर की यात्रा मई आखिरी सप्ताह से शुरू होकर जून के दूसरे सप्ताह तक होती है। इसके बाद बरसात शुरू होने पर गधेरों को पार करन मुश्किल हो जाता है। सितंबर में थोड़े समय के लिए ग्लेशियर की यात्रा होती है। बाद में बर्फबारी के कारण यात्रा नहीं हो पाती है।