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हौले बल्दा हौले गाड़ की सैल्यों धारकी सैल्यों....

Fri, 28 Apr 2017 10:17 PM IST
bageshwar
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गेहूं की मड़ाई करते बैल। - फोटो : अमर उजाला
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कृषि कार्य करने के तौर तरीके और कृषि यंत्रों में पहले की तुलना में हालांकि बहुत परिवर्तन आया है। बावजूद पहाड़ में आज भी गेहूं की मढ़ाई में थ्रेशर का उपयोग ना के बराबर है। पहाड़ के काश्तकार आजकल ‘हौले बल्दा हौले धारकी, सैल्यों गाड़ की सैल्यों’ (बैल हल्के-हल्के चल, जो फसल कटे उससे समृद्धि आए) पहाड़ी कृषि गीत गाकर बैलों से गेहूं की मड़ाई करने में व्यस्त हैं। 
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 पहाड़ के अधिकांश काश्तकारों के पास एक जोड़ी बैल है। इन काश्तकारों की खेती कम है। जिन काश्तकारों ने बैल नहीं पाले हैं वे पड़ोसी के बैलों को लेकर आखिरी में मड़ाई कर पाते हैं। अल्मोड़ा, चमोली, बागेश्वर जिले के गांवों में इन दिनों गेहूं की मड़ाई चल रही है।  डा. हेम चंद्र बताते हैं कि उत्तराखंड में इस प्रकार के कृषि गीतों के गाने से काम करने में थकान का आभास नहीं होता है। किसान क्लब देवनाई घाटी के अध्यक्ष सुंदर बरोलिया ने बताया कि पहाड़ के अधिकांश गांवों में बैलों से गेहूं की मड़ाई करने की परंपरा को आज भी बरकरार रखा है।

ब्लॉक कृषि अधिकारी और गढ़वाल मूल के धन राम आर्या ने बताया कि गढ़वाल के पर्वतीय इलाके के अधिकांश गांवों में भी बैलों या फिर काश्तकार डंडों से गेहूं की मड़ाई करते हैं। जिला कृषि अधिकारी डीके मौर्या ने बताया कि पहाड़ के अधिकांश काश्तकार अब वैज्ञानिक विधि से कृषि कार्य कर रहे हैं। पहाड़ की भौगोलिक स्थिति अलग होने के कारण आज भी अधिकांश कृषक बैलों से गेहूं की मड़ाई करते हैं। 
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