बागेश्वर। प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा पहाड़ से हो रहे खनन के पूरी तरह खिलाफ थे। वह पर्वतीय क्षेत्र में खनन को शरीर से हड्डी निकालने के समान मानते थे। हिमालय पुत्र बहुगुणा वर्ष 1983 में बागेश्वर आए थे। उनके निधन से पर्यावरण प्रेमी खासे मायूस हैं और इस क्षति को उत्तराखंड के साथ ही देश के लिए भी अपूर्णीय बता रहे हैं।
शुक्रवार सुबह जैसे ही लोगों को पर्यावरणविद बहुगुणा के निधन का समाचार मिला तो दुखी हो गए। राज्यपाल से वृक्ष पुरुष की उपाधि पाने वाले किशन सिंह मलड़ा ने बताया कि सुंदर लाल बहुगुणा वर्ष 1983 में बागेश्वर आए थे। डिग्री कॉलेज बागेश्वर में उन्होंने पर्यावरण संरक्षण विषय पर लोगों को जागरूक किया था। मलड़ा कहते हैं कि उनके निधन से पर्यावरण संरक्षण की मुहिम को झटका लगा है। सवाल संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष रमेश पांडेय कृषक उनके साथ आंदोलनों में की गई शिरकत के दौरान का एक वाक्या बताया कि उन्होंने वनों की अलग परिभाषा प्रस्तुत की थी। वह पर्यावरण के पर्याय थे। एडवोकेट गोविंद सिंह भंडारी, रमेश पर्वतीय, दलीप सिंह खेतवाल, जाखनी गांव के हेमवंत सिंह मेहता और जाखनी गांव में चिपको की तर्ज पर आंदोलन शुरू करने वाली महिलाओं ने बहुगुणा के निधन पर दुख जताया है।
बहुगुणा को कौसानी से था खासा लगाव
कौसानी। पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा को कौसानी से भी खासा लगाव रहा। वह लक्ष्मी आश्रम कौसानी भी कई बार आए। आश्रम की मंत्री नीमा वैष्णव ने बताया कि बहुगुणा जीवन पर्यंत पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित रहे। आश्रम के लोगों को भी पर्यावरण संरक्षण के लिए तत्पर रहने के लिए मार्गदर्शन करते थे।
जैंती में ग्राम दान आंदोलन में लिया था भाग
अल्मोड़ा। 1967 में पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा जैंती के भ्रमण पर आए थे। वह पंद्रह दिनों तक पर्वतीय ग्राम स्वराज मंडल जैंती में रहे। उन्होंने सर्वोदयी नेता केदार सिंह कुंजवाल के साथ विनोवा भावे के ग्राम दान आंदोलन में भाग लिया। साथ ही क्षेत्र में कुरीतियों को दूर करने के लिए काम किया।
संसार से ऐसे व्यक्ति विदा हो गए, जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के सुधार के लिए लगा दिया। पर्यावरण की रक्षा और तमाम कुरीतियों को खत्म करने को जीवन समर्पित किया। जैंती में उन्होंने पंद्रह दिन तक रहकर क्षेत्र की सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए लोगों को जागरूक किया। टिहरी बांध विरोध आंदोलन और शराब बंदी आंदोलन में उनके साथ कार्य किया। उन्होंने जो पर्यावरण संरक्षण का मार्ग दिखाया है उस पर सरकारों को काम करना चाहिए। - गोविंद सिंह कुंजवाल (विधायक, जागेश्वर)
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चिपको आंदोलन और पर्यावरण का संदेश देने वाले सुंदरलाल बहुगुणा एक प्रबुद्ध, प्रतिबद्ध गांधीवादी सादगी की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने पूरा जीवन रचना और संघर्ष में व्यतीत किया। उनके निधन ने पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाला एक मनीषी को खो दिया है। अल्मोड़ा महाविद्यालय में पढ़ाई के लिए आए ग्रामीण परिवेश के छात्रों ने पर्वतीय युवा मोर्चा के नाम से संगठन खड़ा कर कोसी कटारमल में एक माह का पौधरोपण शिविर और दीवार बंदी का कार्यक्रम किया था, जिसमें सुंदरलाल बहुगुणा ने भी भाग लिया। छह अक्टूबर 1977 को नैनीताल में वनों की नीलामी के विरोध और टिहरी डैम विरोध आंदोलन में भी भाग लिया। यदि समय रहते बहुगुणा की आवाज को सुना जाता तो जो भयानक संकट जो टिहरी बांध और जल विद्युत परियोजनाओं से पैदा हुआ है उससे बचा जा सकता था। - पीसी तिवारी, केंद्रीय अध्यक्ष, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी