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बेहतर भविष्य की शुभकामनाएं, जन्मदिन मुबारक बागेश्वर 

Thu, 14 Sep 2017 10:24 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बागेश्वर।
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बागेश्वर का विहंगम दृश्य। - फोटो : amar ujala
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15 सितंबर 1997 को गठित बागेश्वर जिला शुक्रवार यानी आज 20 साल का हो गया। विकास के जिस उद्देश्य को लेकर अलग जिला बनाया गया, यहां की जनता दो दशक बाद भी विकास की उस तस्वीर को देखने के लिए तरस रही है।
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शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मामलों में भी जिला बेहद पिछड़ा हुआ है। रोडवेज डिपो तक नहीं बन सका है। स्थिति यह है कि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी देने वाले इस जिले में खेल विभाग के पास एक खेल मैदान तक नहीं है। 

बागेश्वर जिले के लिए यहां की जनता ने लंबी लड़ाई लड़ी। राज्य आंदोलनकारी स्व. गुसांई सिंह दफौटी के नेतृत्व में जिला बनाओ संघर्ष समिति का गठन कर आंदोलन चलाया गया। आखिरकार क्षेत्रीय जनता का संघर्ष रंग लाया और लंबी लड़ाई के बाद यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने बागेश्वर जिले की घोषणा की।
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15 सितंबर 1997 को अल्मोड़ा से अलग होकर बागेश्वर जिला बन गया। जिला बनने के बाद यहां की जनता को क्षेत्र के विकास की उम्मीद थी, लेकिन जनता की यह उम्मीदें जिला गठन के 20 साल पूरे होने पर भी अधूरी हैं।

जिस विकास के उद्देश्य से अलग जिले की लड़ाई लड़ी गई, वह उद्देश्य आज तक पूरे नहीं हो पाए हैं। जिला शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी जरूरतों में भी बेहद पिछड़ा है। जिला गठन के बाद गांवों से जिला मुख्यालय बागेश्वर की ओर पलायन हुआ, जबकि जिला मुख्यालय में बसने वाली जनता के लिए सुविधाओं में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई। 

बागेश्वर जिला बनने के बाद विकास के नाम पर कलक्ट्रेट, विकास भवन और जिला न्यायालय की इमारतें खड़ी की गईं, जबकि शहर में सड़कों का चौड़ीकरण, पार्किंग, पार्क निर्माण जैसी जरूरतों की ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया। वर्तमान में बागेश्वर शहर अतिक्रमण की समस्या से जूझ रहा है। कुछ लोगों ने विकास के नाम पर सड़क से लेकर नदियों तक पर अतिक्रमण कर रखा है।

असुविधाओं के अभाव में गांव छोड़कर सुविधाओं के लिए शहर में आने वाले लोग तमाम समस्याओं से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधा के लिए तहसील के समय में जो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चलता था, जिला गठन के बाद उसी को जिला अस्पताल का दर्जा दे दिया गया।

न अस्पताल का बेहतर भवन बना न मरीजों को स्वास्थ्य सुविधा के लिए यहां पर विशेषज्ञ चिकित्सक नियुक्त किए गए। वर्षों से स्वीकृत बेस अस्पताल तक जिले में नहीं बन पाया है। ट्रामा सेंटर के नाम पर बनाया गया भवन आज भी खाली पड़ा है। 

न्यायालय की शरण में जाने के बाद यहां पर ब्लड बैंक संचालित हो सका। यहां के मरीजों को आज भी अल्मोड़ा या हल्द्वानी जाना पड़ता है। जिले में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक का हाल बुरा है। जिले में 20 साल बाद भी रोडवेज का डिपो नहीं बन सका है।

जिले के खिलाड़ियों के पास अपना एक खेल मैदान और स्टेडियम तक नहीं है। सड़कों के निर्माण में करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद जिले की आधी आबादी यातायात सुविधा से नहीं जुड़ पाई है। जिले की लाहुर घाटी और पिंडर घाटी आज भी संचार सेवा के लिए तरस रही है। लोगों के सुरक्षित चलने के लिए रास्ते और नदियों में झूला पुल तक नहीं हैं। 
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