बागेश्वर। आज बागेश्वर का जन्मदिन है। 23 साल पहले आज ही के दिन बागेश्वर जिले का गठन हुआ था। भगवान बागनाथ, बैजनाथ के धामों के साथ ही पिंडारी ग्लेशियर गौरवशाली इतिहास वाले बागेश्वर की थाती है। हालांकि गठन के 23 साल बाद भी बागेश्वर वह मुकाम नहीं मिल पाया, जिसका हकदार था। आज जिला खड़िया खनन के लिए अवश्य जाना जाता है। जिला मुख्यालय में सीवर लाइन तक नहीं बन गई है। जिला मुख्यालय पर अतिक्रमण की मार पड़ रही है। जिले में अधिकारियों का भी टोटा है। जिले को उम्मीद है कि जल्द उसे उपहार स्वरूप अतिक्रमण से मुक्ति, सीवरेज सिस्टम और पर्याप्त संख्या में अधिकारी मिलेंगे।
बाबा बागनाथ की धरती को अतिक्रमण से मिले मुक्ति
बागेश्वर। भगवान बागनाथ की धरती जबरदस्त तरीके से अतिक्रमण की चपेट में है। लोगों ने सरयू नदी को भी नहीं छोड़ा है। नदी तटों पर तक कब्जा जमा कर भवन खड़े कर दिए गए हैं। प्रशासनिक कार्रवाई कभी-कभार नोटिस जारी करने तक सीमित रहती है। अतिक्रमण जिला मुख्यालय की बड़ी समस्या बन गई है। अतिक्रमण के कारण शहर की सड़कें संकरी हो गई हैं। संकरी सड़कें अक्सर जाम का कारण बनती हैं।
नगर में जल्द बने सीवरेज सिस्टम
बागेश्वर। 50 हजार आबादी वाले बागेश्वर शहर में सीवर लाइन नहीं है। इस कारण भूजल प्रदूषित हो रहा है। बरसात में लोग घरों में बने शौचालयों के पिट खोल देते हैं। जिसकी गंदगी नदियों में समाती है। सीवरेज सिस्टम का प्रस्ताव लंबे समय से शासन में लटका हुआ है। इसके न बनने के पीछे सबसे बड़ा कारण पानी की पर्याप्त उपलब्धता न होना है। यानि कि सरयू और गोमती के तट पर बसे बागेश्वर में पेयजल की कमी सीवरेज सिस्टम पर भी भारी पड़ रही है।
विभागों में कुर्सियां न रहें खाली
बागेश्वर। बागेश्वर के तमाम विभागों में अधिकारियों के पद रिक्त हैं। जिले में 104 के स्थान पर मात्र 73 चिकित्सक कार्यरत हैं। जिला अस्पताल और बैजनाथ के अस्पताल में रे डियोलॉजस्ट का पद रिक्त पड़ा है। जिला समाज कल्याण अधिकारी का पद रिक्त है। कांडा, कपकोट, गरुड़, काफलीगैर, दुग-नाकुरी में तहसीलदार नहीं है। शामा उप तहसील में नायब तहसीलदार की तैनाती नहीं है।
खनन के नाम पर न चीरा जाए पहाड़ का सीना
बागेश्वर। बागेश्वर जिले को अब खड़िया खदानों के लिए ही जाना जाता है। जिले में 60 से अधिक खड़िया खानें अस्तित्व में हैं। भले ही इससे सरकार को भारी भरकम राजस्व की प्राप्ति हो रही हो लेकिन पर्यावरण को जबरदस्त पलीता लग रहा है। खड़िया खदानों से पर्यावरण, जल स्रोतों को नुकसान पहुंचता है। खड़िया खदानों में नियमों के विपरीत मशीनों का भी उपयोग किया जाता है। खड़िया खदानों में नियमों के उल्लंघन की बानगी बीते जुलाई में कांडा क्षेत्र में देखने को मिली थी। 27 जुलाई को कांडा तहसील प्रशासन ने बरसात में खनन पर रोक के बावजूद खड़िया खदान में काम होते पाया था। खड़िया खदान में गड्ढों को भरा नहीं गया था। इस पर कार्रवाई भी हुई थी।