सरकार की अदूरदर्शिता के कारण प्रदेश के हजारों अतिथि शिक्षक बेरोजगार हो गए हैं। भविष्य में सरकारी शिक्षक बनने की उम्मीद में प्राइवेट स्कूलों की नौकरी छोड़कर अतिथि शिक्षक बने युवा प्रदेश के मौजूदा राजनीतिक हालातों के बाद अपने भविष्य को लेकर बेहद चिंतित हैं। इनमें ऐसे युवा भी शामिल हैं, जो इससे पहले विभिन्न क्षेत्रों में संविदा पर नौकरी कर रहे थे। लेकिन, बेहतरी की उम्मीद में नौकरी छोड़कर अतिथि शिक्षक बने युवाओं की स्थिति अब न इधर के न उधर के वाली हो गई है।
सरकार ने अतिथि शिक्षकों को अधर में लटका दिया है। सियासी दलों की खींचतान में बेरोजगारों का भविष्य चौपट हो रहा है। आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश के सभी अतिथि शिक्षकों को नए सत्र में जल्द से जल्द नियुक्ति दी जानी चाहिए।
- मनोज कुमार खोलिया।
गेस्ट टीचरों को जल्द ही पुनर्नियुक्ति मिलनी चाहिए। गेस्ट टीचरों की नियुक्ति के बाद प्रदेश के सरकारी शिक्षा व्यवस्था में जो सुधार आया है, उसको देखते हुए अभिभावक भी चाहते हैं कि अतिथि शिक्षकों को इस सत्र में भी शिक्षण कार्य का मौका मिलना चाहिए। सरकार उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती है।
- प्रेम मनराल।
सत्र 2015-16 में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति के बाद शिक्षा व्यवस्था में काफी सुधार आया। अतिथि शिक्षकों ने दुर्गम स्कूलों में जाकर शिक्षण कार्य किया। बावजूद इसके उन्हें पुनर्नियुक्ति नहीं दी गई। सरकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए अतिथि शिक्षकों को फिर से नियुक्ति दी जानी चाहिए।
- प्रकाश रावत।
अतिथि शिक्षक अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। पूरी योग्यता और प्रक्रिया के बाद नियुक्ति देने के बाद भी यह भेदभाव समझ से परे है। प्रशासन को शीघ्र नए सत्र में सभी अतिथि शिक्षकों को नियुक्ति देनी चाहिए। इससे अतिथि शिक्षकों के साथ ही स्कूली बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित होगा।
- भगवत खेतवाल।
सरकारी की स्पष्ट नीति नहीं होने के कारण अतिथि शिक्षक स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। अधिकांश अतिथि शिक्षक विभिन्न क्षेत्रों में नौकरियां छोड़कर आए हैं। यदि पुनर्नियुक्ति नहीं दी गई तो मजबूरन अतिथि शिक्षकों को साथ लेकर आंदोलन किया जाएगा।
- सुंदर कोरंगा, अध्यक्ष, अतिथि शिक्षक संगठन।
नए सत्र में नियुक्ति नहीं मिलने से अपने भविष्य को लेकर बेहद चिंता में हूं। आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है। सरकारी शिक्षण में बेहतर भविष्य को लेकर अतिथि शिक्षक बनने के लिए प्रयास किया था। शासन-प्रशासन की बेरुखी के कारण अब बेगार बैठना पड़ रहा है।
- किशन नेगी।