गरुड़ के कनस्यारी गांव में गेहूं के पौधों से चारा काटते लोग। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : BAGESHWAR
बागेश्वर। किसान अब गेहूं की फसल को एक बार पशु चारे के लिए और दूसरी बार अनाज के लिए काट सकेंगे। यह संभव होगा गेहूं की वीएल प्रजाति से। इसे विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने विकसित किया है। कृषि विज्ञान केंद्र की देखरेख में पहली बार इस जिले में गेहूं की इस प्रजाति की खेती की जा रही है। इससे किसान हरा चारा और अनाज दोनों ही प्राप्त कर सकेंगे।
विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा के निदेशक डॉ. लक्ष्मीकांत और उनके सहयोगियों ने वीएल 829 प्रजाति विकसित की है। इस प्रजाति के गेहूं की पर्वतीय क्षेत्र के सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्रों में खेती की जा सकती है। इससे गेहूं की अच्छी पैदावार होती है। गेहूं के पौधे कुछ बड़े होने पर इन्हें एक बार चारे के लिए काटा जा सकता है। इसका उपज पर कोई असर नहीं पड़ेगा। दिसंबर और जनवरी के महीने में पर्वतीय क्षेत्र में हरे चारे की काफी कमी रहती है। ऐसे में यह प्रजाति किसानों के लिए बहुत ही लाभकारी साबित हो सकती है।
कनस्यारी गांव में पशु चारे के लिए हुआ कटान
बागेश्वर। सोमवार को केवीके के वैज्ञानिकों की देखरेख में गागरीगोल के कनस्यारी गांव में किसान केशर सिंह भरड़ा के खेत में वीएल 829 प्रजाति के गेहूं को पशु चारे के लिए काटा गया। केवीके के प्रभारी अधिकारी डॉ. कमल कुमार पांडे, आत्मा परियोजना के उप परियोजना निदेशक धीरज बिष्ट ने किसानों को विभिन्न जानकारियां दीं। डॉ. पांडे ने बताया कि कनस्यारी, ह्वीलकुलवान, कपकोटी, नैछीबगड़ में तीन हेक्टेयर क्षेत्रफल में वीएल 829 गेहूं की प्रजाति का गेहूं बोया गया है।
कोट
वीएल 829 गेहूं की प्रजाति में पीला और भूरा रतुवा रोग नहीं लगता। इस प्रजाति की खासियत यह है कि अक्तूबर के प्रथम पखवाड़े में बुवाई करने पर 70 से 90 दिनों में जमीन से 4-5 सेमी ऊपर से पैधा काटकर चारा प्राप्त किया जा सकता है। इस चारे से दुग्ध उत्पादन भी बढ़ेगा।
-कमल कुमार पांडे, प्रभारी अधिकारी, कृषि विज्ञान केंद्र काफलीगैर (बागेश्वर)