पहाड़ों पर पारंपरिक खेती धीरे-धीरे सिमट रही है। लागत और मेहनत के सापेक्ष मुनाफा नहीं होने से किसान खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। कुछ जागरूक किसान नई तकनीकी जानकारी हासिल कर खेती के स्वरूप में बदलाव कर अच्छा लाभ कमा रहे हैं लेकिन इनकी संख्या सीमित है। सिमटती खेती को बचाने के लिए किसानों को फसलों के विविधीकरण के क्षेत्र में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।कृषि में नवाचार के लिए राजकीय महाविद्यालय कांडा के सहायक प्राध्यापक डॉ. चमन कुमार का शोध कार्य जारी है।
दो शोध सहायक नेहा खेतवाल और कनिका नैनवाल की मदद से उन्होंने अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, नैनीताल, पिथौरागढ़ और ऊधमसिंह नगर जिलों के विभिन्न गांवों में फील्ड सर्वेक्षण किया। उन्होंने 500 से अधिक किसानों के साक्षात्कार और प्रश्नावली के माध्यम से आंकड़े एकत्र किए हैं।
पहाड़ों में पारंपरिक खेती के सिमटने पर अध्ययन चल रहा है। आगामी चरणों में किसानों के साथ गोष्ठियां की जाएंगी। मिट्टी की जांच रिपोर्ट के अनुसार उन्हें फसल उत्पादन करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। शोध के आधार पर नीति निर्माताओं के लिए प्रदेश में कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुशंसा तैयार की जाएगी।
-डॉ. चमन कुमार, सहायक प्राध्यापक, राजकीय महाविद्यालय कांडा
पारंपरिक खेती घटने के प्रत्यक्ष कारक
डॉ. चमन कुमार बताते हैं कि प्रारंभिक सर्वे में पहाड़ों से पारंपरिक खेती के कम होने के कई कारक मिले हैं। जंगली जानवर, जलवायु परिवर्तन, सिंचाई सुविधाओं की कमी, किसानों की बाजार तक पहुंच का न होना, भंडारण सुविधा न होना, आधुनिक तकनीकी जानकारी का अभाव और पलायन ने भी खेतीबाड़ी को कम किया है। खेती की कम होती उर्वरकता और मिट्टी की प्रकृति के अनुरूप फसल का चयन नहीं करने के कारण भी कम लाभ होने से किसान खेती से विमुख होने लगे।