पहाड़ की परंपरागत फसलों को पर्यटक काफी पसंद कर रहे हैं, लेकिन मांग के अनुसार स्थानीय वस्तुएं उपलब्ध नहीं हैं। उत्पादन बढ़ने पर इसका दोहरा लाभ हो सकता है। स्थानीय फसलों को बाजार उपलब्ध कराने की सरकार की पहल भी तभी कारगर साबित होगी।
कुमाऊं मंडल विकास निगम के कौसानी स्थित आवास गृह के प्रबंधक तारा दत्त तिवारी ने बताया कि यहां लीज पर स्टाल लगाया गया है, जिसमें मडुवे का आटा, गहत, राजमा, भट, उड़द, अखरोट, स्थानीय चाय, बुरांश, फलों के उत्पाद, ऊन, रिंगाल आदि से बनी वस्तुएं बेची जाती हैं।
कुछ निजी प्रतिष्ठानों पर भी इसकी विक्री होती है। आवास गृह में मडुवे की रोटी, भट, गहत की दाल, डुबके और अन्य परंपरागत व्यंजन सैलानियों को परोसे जाते हैं। पर्यटक इन्हें पसंद भी कर रहे हैं।
सैलानियों के बीच इन चीजों की गुणवत्ता का प्रचार हो रहा है। पयर्टक पकाने की तकनीक सीखकर दाल, आटा आदि खरीदकर ले जाते हैं, लेकिन मांग के अनुसार चीजें उपलब्ध नहीं हो पाती। इस साल गहत उपलब्ध नहीं हो रही है। पर्यटक खाली हाथ लौट रहे हैं।
मुख्य कृषि अधिकारी के कार्यालय के अनुसार पिछले साल खरीफ में गहत की पैदावार 188 हेक्टेयर क्षेत्र में 97 क्विंटल, भट 833 हेक्टेयर में 917 क्विंटल, सोयाबीन 112 हेक्टेयर में 90 क्विंटल, उड़द 167 हेक्टेयर में 94 क्विंटल, राजमा क 31 हेक्टेयर में 25 क्विंटल, मडुवा 6093 हेक्टेयर 7970 क्विंटल पैदा हुआ।
इस बार भी कुछ फसलों का उत्पादन बढ़ा तो कुछ का कम हो गया है। खरीफ में इस बार जिले में 6010 हेक्टेयर क्षेत्र में 7212 क्विंटल मडुवा, 170 हेक्टेयर में 461 क्विंटल चौलाई, 220 हेक्टेयर में 135 क्विंटल गहत, 528 हेक्टेयर में 581 क्विंटल भट की पैदावार हुई है।