डीजे संस्कृति ने पहाड़ की लोक परंपरा को निगल लिया है। नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को भूल गई है। बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में सदियों पहले जिस स्थान पर कभी झोड़ा-चांचरी और बैर-भगनौल गाए जाते थे, वहां कुछ बुजुर्ग महज हुड़के की थाप पर इस पंरपरा को निभा रहे हैं।
सरयू और गोमती नदियों के संगम पर लगने वाले उत्तरायणी मेले का विशेष महत्व है। यहां पर प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, लेकिन समय के साथ-साथ काफी कुछ बदल गया है। बताया जाता है कि पहले बागेश्वर के चौक बाजार में मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर रात भर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। दूर क्षेत्रों से हुड़का लेकर लोक कलाकार यहां आते थे। कुमाऊं, गढ़वाल और नेपाल से स्नान के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलाव जलाया जाता था।
गंगा स्नान, बागनाथ दर्शन और जनेऊ संस्कार के लिए आने वाले श्रद्धालु पूरी रात चौक बाजार में बैठकर लोक कलाकारों की प्रस्तुति को देखते थे। झोड़ा, चांचरी, बैर, भगनौल, आण-काथ का आयोजन रात भर होता था। सुबह को स्नान और बागनाथ की पूजा अर्चना की जाती थी। मगर नई पीढ़ी इस चौक बाजार के बारे में कुछ नहीं जानती है। आज यहां लोक कलाकारों के कार्यक्रम देखने के लिए न ही दर्शक और न ही जनप्रतिनिधि या अधिकारी आते हैं। कुछ बुजुर्ग कलाकार फिर भी यहां आकर हर साल परंपरा निभा रहे हैं। उनके भीतर उपेक्षा की टीस तो नजर आती है, लेकिन अपनी संस्कृति और परंपरा को निभाने की धुन में रमे वह उपेक्षा के इस दर्द को बाहर नहीं छलकने देते हैं।
शराबियों से परेशान नजर आए कलाकार
बागेश्वर। चौक बाजार में उचित प्रकाश की व्यवस्था नहीं है। हर साल की तरह इस साल भी अलाव जलाकर रस्म पूरी की गई है। शनिवार रात दूर दराज से आए बुजुर्ग कलाकार शराबियों के कारण परेशान रहे। वहीं मोहन दा, धनीराम आदि कलाकारों ने बैर, भगनौल और झोड़ा, चांचरी गाई।
युवा भी सीखें झोड़ा-चांचरी गीत
बागेश्वर। उत्तरायणी पर्व में बाड़ेछीना के अलाई गांव के मोहन दा पिछले 40 सालों से बागेश्वर आ रहे हैं। 70 वर्षीय लोक कलाकार मोहन ने बताया कि पहले यहां काफी रौनक होती थी। गढ़वाल से भी वाद्य यंत्रों के साथ कलाकार यहां आते थे। उनमें अधिकतर लोक कलाकार अब जीवित नहीं हैं। नई पीढ़ी मंच पर आयोजित होने वाली तड़क-भड़क गीतों को अधिक पसंद करती है। युवाओं को भी झोड़ा-चांचरी सीखनी चाहिए ताकि यह सांस्कृतिक विरासत जीवित रह सके।