डॉ. नवीन जोशी।
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बागेश्वर। उत्तराखंड में कई ऐसे पौधे हैं, जिन्हें खरपतवार की श्रेणी में मानकर बेकार समझ लिया जाता है, जबकि इन पौधों में दुर्लभ औषधीय गुण होते हैं। ऐसी ही एक वनस्पति है, दूधी जो बरसात में हिमालय की तलहटी और मैदानी इलाकों में बहुतायत पाई जाती है। इस पौधे में कील मुंहासे से निजात दिलाने के गुण के साथ श्वांस नलिका में सूजन समेत कई बीमारियों के उपचार की क्षमता है।
घास के रूप में नजर आने वाली दुधिया घास मिल्क एडम के नाम से भी जानी जाती है। संस्कृत में इसे दुग्धिका, नागार्जुनी के नाम से भी जाना जाता है। यूफोरबिया हिरता लेटिन नाम से प्रचलित यह वनस्पति अपनी रेसेदार पत्तियों और तनों निकलने वाले दूध (लेटेक्स) के लिए जानी जाती है। इसकी बड़ी दूधी और छोटी दूधी दो प्रजातियां पाई जाती हैं। दूधी घास अपने नाम के अनुरूप स्तनपान कराने वाली माताओं में दुग्ध की वृद्धि करती है।
चेहरों पर होने वाले कील, मुंहासों दूधी घास का दूध काफी लाभकारी होता है। दूधी का स्वरस कनेर के पत्तों के स्वरस के साथ मिलाकर लगाने से बालों का सफेद होना और झड़ना रुक जाता है।
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय देहरादून के डॉ. नवीन जोशी (एमडी आयुर्वेद) बताते हैं कि महिलाओं की माहवारी से संबंधित समस्या में हरी दूधी को छाया में सुखाकर कूटकर देने से मासिक रक्तस्राव नियंत्रित होता है। खूनी दस्त और आंव में भी दूधी से काफी लाभ मिलता है। महिलाओं में होने वाली लिकोरिया (श्वेतप्रदर) की समस्या में काफी लाभ देती है। इसकी जड़ को साफ कर तीन से पांच ग्राम की मात्रा में छानकर दिन में दो से तीन बार देने से श्वेतप्रदर की समस्या में काफी लाभ मिलता है। दूधी का प्रयोग पैर में चुभे कांटे को निकालने में वैद्य करते हैं। कांटे वाले स्थान पर दूधी को पीसकर लेप करने से कांटा निकल जाता है। (कालिका रावल)
दमा में भी दूधी का प्रयोग काफी लाभदायक होता है। दूधी को तय मात्रा में शहद के साथ देने से सांस की तकलीफ में आराम मिलता है। इसी कारण इसे अस्थमा प्लांट भी कहा जाता है। इसे श्वांस नलिका की सूजन कम करने वाला एंटीबैक्टिरयल प्रभाव से युक्त पाया गया है।
डॉ. नवीन जोशी (एमडी आयुर्वेद) उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय देहरादून।
औषधि:दूधी घास।- फोटो : BAGESHWAR