बागेश्वर। कमेड़ीदेवी-रंगथरा-मजगांव-चौनाला मोटर मार्ग निर्माण में कट रहे जाखनी के जंगल को बचाने के लिए ग्रामीण एकजुट हो गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि भले ही गांव को सड़क से मत जोड़ो, लेकिन उनके पाले गए पेड़ों और जंगल को नुकसान मत पहुंचाओ।
सोमवार को महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर एक नए चिपको आंदोलन की संकल्प लिया था। मंगलवार को ग्रामीणों ने कहा कि सड़क का विरोध करना उनका मकसद नहीं है। उनका उद्देश्य अपने जंगल की रक्षा करना है।
जाखनी के ग्रामीणों ने गांव से सड़क काटने की बजाय खारीगाड़-रंगथारा से मोटर मार्ग का निर्माण करने और उसे कमेड़ीदेवी-स्यांकोट मोटर मार्ग से जोड़ने का सुझाव भी दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि चौनाला तक पहले से सड़क बनी है। मजगांव तक सड़क का कटान हो चुका है। इसका सर्वे बदलकर खारीगाड़ तोक से निर्माण किया जा सकता है।
पेड़ों की वजह से ही आज भरपूर पानी है जाखनी में
बागेश्वर। जाखनी गांव जंगल के बीच में बसा है। गांव में 600 की आबादी है। करीब आठ किमी के क्षेत्रफल में गांव का जंगल फैला है। जहां बांज, बुरांश और उतीस के 10 हजार से अधिक पेड़-पौधे हैं। इनमें 90 प्रतिशत पेड़ बांज के हैं। बांज के पेड़ अधिक होने से गांव में प्राकृतिक स्रोतों में भरपूर पानी है। कई पीढ़ियों से गांव के लोग इस जंगल का संरक्षण करते आए हैं। एक तरफ हम जल और पर्यावरण संरक्षण की बात करते हैं, दूसरी तरफ सड़क के लिए करीब दो किमी के क्षेत्रफल में एक हजार से अधिक पेड़-पौधों को भेंट चढ़ाने की तैयारी है। बच्चों की तरह पाले पेड़ों को काटे जाने से ग्रामीण आहत हैं और इसका विरोध कर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि उनके गांव और क्षेत्र की पहचान जंगल से है। अगर जंगल के बीचोंबीच से सड़क गुजरेगी तो आने वाले समय में लकड़ी तस्करी को बढ़ावा मिलेगा। कहा कि सड़क बनने से जो विकास होगा, उसकी तुलना में कहीं अधिक वनों का विनाश होगा।
ग्राम प्रधान ईश्वर सिंह मेहता, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य जोगा सिंह मेहता, सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत सिंह मेहता ने कहा कि अपने पूर्वजों के बसाए जंगल को बचाने के लिए ग्रामीण पूरा जोर लगाएंगे। विकास के नाम पर जबरन पेड़ काटे जाने का ग्रामीण मरते दम तक विरोध करते रहेंगे।
विभाग ने बताए 43 पेड़, ग्रामीणों को एक हजार पेड़ कटने की आशंका
बागेश्वर। मोटर मार्ग निर्माण में पेड़ों के कटान को लेकर जाखनी गांव के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य जोगा सिंह मेहता ने वन विभाग से सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सूचना मांगी थी। धरमघर वन क्षेत्र के रेंजर की ओर से दी गई सूचना में मजीगांव, जाखनी और सेरी की सिविल भूमि और वन पंचायत के भीतर 43 बांज के पेड़ काटने की बात कही गई है। पेड़ कटान का आधार समुद्रतल से एक हजार मीटर से अधिक की ऊंचाई पर हरे पेड़ों के कटान की अनुमति में विशेष छूट मिलने के प्रावधान को बताया गया है। इधर ग्रामीणों का कहना है कि एक किमी क्षेत्रफल में ही 500 से अधिक छोटे-बड़े पेड़ हैं। दो किमी सड़क कटान के दौरान एक हजार के करीब छोटे-बड़े बांज के पेड़ों का कटान निश्चित है। (संवाद)
पेयजल स्रोत ध्वस्त होने से 600 परिवार रह जाएंगे प्यासे
बागेश्वर। जाखनी गांव से कट रही सड़क से गांव के दो प्रमुख पेयजल स्रोतों के ध्वस्त होने का खतरा बना हुआ है। ग्रामीणों ने बताया कि एक स्रोत प्रस्तावित सड़क के बीचोंबीच और दूसरा नीचे है। सड़क कटान के मलबे से दोनों पेयजल स्रोत पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे। अगर ऐसा हुआ तो पूरे गांव में पेयजल संकट गहरा जाएगा। पीने के पानी का अन्य विकल्प नहीं होने के कारण ग्रामीणों के सामने प्यासे मरने की नौबत आ जाएगी। (संवाद)
क्या था चिपको आंदोलन
चिपको आंदोलन पर्यावरण रक्षा का आंदोलन था। यह आंदोलन उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के चमोली जिले में 1973 में शुरू हुआ हुआ। एक दशक के अंदर यह पूरे उत्तराखंड में फैल गया था। इस आंदोलन में महिलाओं ने भारी संख्या में भाग लिया था और इन पेड़ों को कटने से बचाने के लिए वे इससे चिपक गईं थीं। गौरा देवी के नेतृत्व में रेणी गांव की 27 महिलाएं इस आंदोलन की अग्रणी रहीं थीं।