सुरक्षित बागेश्वर विधानसभा सीट में कांग्रेस अभी भी डैमेज कंट्रोल में ही उलझी नजर आ रही है। कांग्रेस की बगावत का फायदा मिलने से भाजपा की बांछें तो खिली हैं लेकिन हाथी की चाल से थोड़ी बैचेनी भी है। भाजपा कहीं पर 10 साल की उपलब्धियों को तो कहीं पर मोदी चेहरे के साथ मैदान में है।
टिकट बंटवारे के बाद बागेश्वर में भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों में बगावत हुई थी। जहां भाजपा ने बागियों को बाहर का रास्ता दिखाने के साथ डैमेज को मैनेज किया वहीं कांग्रेस में बिखराव से भाजपा को सीधा फायदा मिला। भाजपा चिर परिचत चेहरे के साथ मतदाताओं के बीच पहुंच रही है। दो बार विधायक रह चुके भाजपा के प्रत्याशी चंदन राम दास तीसरी बार जनता के बीच हैं। उनके पास गिनाने को 10 साल की उपलब्धियां हैं। जहां पर विकास कार्यों का मुद्दा पीछे है वहां पर मोदी का चेहरा आगे है।
यहां पर कांग्रेस के पास जनता को गिनाने के लिए पुरानी उपलब्धियां तो बहुत हैं लेकिन पार्टी बगावत से बाहर नहीं निकल सकी है। पिछले चुनावों में कांग्रेस के राम प्रसाद टम्टा महज 1911 वोटों से चुुनाव हारे थे। इस बार बालकृष्ण दावेदार हैं। बगावत के बाद कार्यकर्ताओं को एकजुट-एकमत करना अभी भी कांग्रेस के लिए मुश्किल बना हुआ है। पूर्व मंत्री राम प्रसाद की नाराजगी पार्टी दूर नहीं कर सकी है। उनके कई समर्थक भाजपा में शामिल हो चुके हैं। स्थिति को भांपते हुए कांग्रेस एससी विभाग के राष्ट्रीय सचिव स्वयं यहां पर डटे हुए हैं।
चुनाव में अब महज सात दिन का समय शेष रह गया है। ऐसे में रूठों को मनाएं या प्रचार के लिए मतदाताओं तक पहुंचे यह पार्टी नेताओं के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। प्रचार में पिछड़ने पर काडर वोट के भी हाथ से निकलने का खतरा है। हालांकि पार्टी नेताओं के अनुसार जल्दी ही सब पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने वाली बसपा दोनों पार्टियों के वोट बैंक में सेंधमारी के प्रयास में जुटी है। बसपा के नए चेहरे बसंत कुमार हाथी के साथ तेज चाल चल रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन जैसे कई मुद्दों के साथ बसपा जनता के बीच पहुंच रही है। कुल मिलाकर इस बार बागेश्वर सीट में त्रिकोणीय मुकाबला नजर आ रहा है।
बागेश्वर सीट में 2012 के चुनावों की स्थिति
भाजपा - 23396
कांग्रेस - 21485
बसपा - 9877