बागेश्वर। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद बागेश्वर जिले में विकास के लिए 25 अरब से अधिक रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा के से जुड़ी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकी। गांवाें से पलायन की रफ्तार और तेज हुई है।
बागेश्वर जिला 1997 में अस्तिस्व में आया। तब से 2000 तक जिले को विकास मद में 63 करोड़, 87 लाख, 65 हजार रुपए मिले। इसके उपरांत 2004 तक के चार सालों में एक अरब 23 करोड़, 36 लाख 62 हजार रुपए, तब से वर्तमान तक के आठ सालों में कुल 23 अरब, 82 करोड़, 42 लाख, 37 हजार रुपए का बजट मिला। राज्य बनने के बाद जिले के विकास के लिए 25 अरब, पांच करोड़, 78 लाख 99 हजार रुपए आ चुके हैं। आंकड़े बताते हैं कि राज्य बनने के बाद जिले में सड़क, पर्यटन, चिकित्सा, पेयजल, सिंचाई, उद्यान,जलागम, शिक्षा और समाज कल्याण विभाग को तुलनात्मक रूप से पहले के मुकाबले कई गुना अधिक धन मिला है। सड़कों, स्कूलों, पेयजल योजनाओं में भी संख्यात्मक वृद्धि हुई है। दूसरी तरफ कृषि क्षेत्र 24 हजार हेक्टेयर से घटकर 23 हजार हेक्टेयर रह गया है। भेड़ पालन,पशुपालन में कमी आई है। वानिकी और कृषि आधारित विकास के लिए इन तेरह सालों में सबसे कम बजट मिला है। जिले के तमाम गांवों से लोगों का निरंतर पलायन हो रहा है। इस बार पंचायतों के परिसीमन में 12 नई ग्राम पंचायतें अस्तित्व में आई। इनमें 10 ग्राम पंचायतें शहरी क्षेत्र में बनी हैं। उत्तराखंड बनने के बाद लोग अपने गांवों को छोड़कर भराड़ी, कपकोट, बागेश्वर आदि स्थानों पर घर बनाकर अथवा किराए के मकानों में रह रहे हैं। सैन्य परिवार और बहुत से कारोबारी तराई में बस गए हैं। इन तेरह सालों में पलायन की गति तेज हुई है। दैवीय आपदाएं भी इसका एक बड़ा कारण है। जिले में आज भी आपदा प्रबंधन विभाग का अपना ढांचा नहीं है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में साहसिक पर्यटन, जड़ी-बूटी उत्पादन, भेड़ पालन, मत्स्य पालन और शीतोष्ण बागवानी विकास की व्यापक संभावनाएं हैं लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी मूलभूत सुविधओं के अभाव में यहां के लोग निरंतर पलायन कर रहे हैं।