बागेश्वर। जिले के 98 निजी विद्यालयों ने आरटीई पोर्टल में पंजीकरण करवा लिया है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत गरीब परिवारों के बच्चों के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें मुफ्त शिक्षा के लिए आरक्षित होती हैं। प्री-प्राइमरी से लेकर आठवीं कक्षा तक निशुल्क पढ़ाया जाता है।
आरटीई अधिनियम का उद्देश्य शिक्षा को प्रत्येक बच्चे तक शिक्षा पहुंचाना है। आरटीई के शुरुआती वर्ष 2011-12 में जिले के 44 विद्यालयों में केवल 196 सीटें उपलब्ध थीं, जबकि 2024 में जिले के 98 निजी विद्यालयों में 641 सीटें उपलब्ध हैं। शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया था कि पंजीकरण न कराने वाले विद्यालयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस वजह से जिले के निजी विद्यालयों ने आरटीई पोर्टल में 20 जून तक पंजीकरण करवा लिया है। पंजीकरण के साथ ही विद्यालयों ने सीटों का विवरण भी अपलोड किया है, ताकि छात्र छात्राएं आरटीई पोर्टल में स्कूल का ब्योरा देखकर प्रवेश के लिए आवेदन कर सकें।
प्रवेश के लिए इन बच्चों का किया जाता है चयन
बागेश्वर। आरटीई के तहत अपवंचित वर्ग और कमजोर वर्ग के बच्चों को कक्षा एक और प्री-प्राइमरी में प्रवेश दिया जाता है। अपवंचित वर्ग में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनाथ बच्चे, दिव्यांग बच्चे, विधवा, तलाकशुदा महिला के बच्चों को शामिल किया गया है, जिनकी वार्षिक आय 80 हजार रुपये से कम होनी चाहिए। इनके अलावा एचआईवी पॉजीटिव बच्चे और एचआईवी पॉजीटिव माता-पिता के बच्चे, निशक्त व्यक्ति, दिव्यांग, कुष्ठ रोगी जिनकी वार्षिक आय 4.5 लाख रुपये से कम हो उन्हें आरटीई के तहत सीट दी जाती है।
वहीं कमजोर वर्ग में ऐसे अभिभावकों के बच्चे आते हैं जिनकी वार्षिक आय 55 हजार रुपये से कम है। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले बीपीएल परिवार के बच्चे भी योजना का लाभ उठा सकते हैं। अपवंचित वर्ग और कमजोर वर्ग के लिए उपलब्ध सीटों में से 50 प्रतिशत सीटें बालिकाओं को देना अनिवार्य है।
विद्यार्थी 25 जून से कर सकते हैं आवेदन
बागेश्वर। आरटीई से निजी विद्यालयाें में प्रवेश के लिए आवेदन 25 जून से शुरू होने हैं जो दस जुलाई तक किए जाएंगें। इसमें बच्चे अपने क्षेत्र और पसंद के अनुसार निजी विद्यालयों के लिए आवेदन कर सकते हैं। बच्चे एक साथ कई विद्यालयों में आवेदन कर सकते हैं।
जीएस सौन, मुख्य शिक्षाधिकारी बागेश्वर ने कहा कि निजी विद्यालयों में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के 25 फीसदी बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य है। इसकी लगातार निगरानी की जाती है।