बागेश्वर। सरकार एक तरफ कृषि की बेहतरी के लिए बड़ी-बड़ी बातें कर रही है, लेकिन उसके पास जंगली जानवरों से कृषि को बचाने के लिए कोई योजना नहीं है। नरगोली, देवलेत, देवतोली, सुलटुई और सिमायल जैसे तमाम गांव ऐसे हैं जहां जंगली सुअर किसी विपदा से कम नहीं हैं। इन गांवों में सुअरों ने पिछले समय में खरीफ की फसल चौपट कर दी थी।
किसानों के पास अगले साल बोने के लिए बीज के तक नहीं बचे। सुअर अब रबी की फसल को खोदने में सक्रिय हो गए हैं। सुअरों का बंदोबस्त न होने के कारण कई किसान काश्तकारी को अलविदा कहकर पलायन भी कर चुके हैं।
किसान पिछले कई सालों से खेती को जंगली जानवरों से निजात नहीं मिलने के कारण परेशान हैं। अनेक मंचों से वे सरकार से जंगली जानवरों से निजात दिलाने की मांग कर चुके हैं, लेकिन शासन और वन विभाग के कानों जूं तक नहीं रेंग रही।
देवलेत गांव के काश्तकार जगदीश साहनी का कहते हैं सुअरों के झुंड ने पिछली बार खरीफ की फसल चौपट कर दी थी। अब खेतों में रबी के फसलों के बीज अंकुरित हो रहे हैं तो सुअरों ने उन्हें भी खोद दिया है।
देवतोली के काश्तकार जगदीश राम कहते हैं कि गांवों में रोजगार के संसाधन कुछ भी नहीं है। खेती अच्छी हो जाए तो साल का राशन निकल जाता है, लेकिन सुअरों के आतंक से यह भी चौपट होता जा रहा है। सुअरों से निजात के लिए कई बार मांग कर दी है, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है।
नरगोली के महेश रौतेला कहते हैं कि जंगली जानवर और आवारा पशुओं का इंतजाम न होने से कई किसान काश्तकारी छोड़ चुके हैं। यदि जानवरों का इंतजाम हो जाए तो लोग कृषि और फलोत्पादन से अपनी आमदनी दोगुनी कर सकते हैं। इससे पलायन पर भी काफी हद तक अंकुश लग सकेगा।
काश्तकार देव राम का कहना है कि कुछ साल पहले खेतों से वर्षभर का अनाज प्राप्त होता था। कई लोग अपनी आवश्यकता की पूर्ति करने के बाद उसे बाजार में बेचते भी थे। जब से जंगली जानवरों का आतंक मचा है तब से खेतों से अगले साल बोने के लिए बीज भी नहीं बच पा रहे हैं।