बागेश्वर। गांव के नीचे जमीन को काटती शंभू नदी और गांव के ठीक पीछे से दरकती पहाड़ी ने कुंवारी गांव के अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया है। कुंवारी गांव के लोग पिछले दो दशकों से आपदा का दंश झेल रहे हैं। लगभग 110 परिवारों वाले कुंवारी गांव में कभी चहल-पहल हुआ करती थी, लेकिन आपदा की पीड़ा झेलते-झेलते अधिकांश परिवारों के पलायन करने से अब गांव में लगभग 64 परिवार हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि कुंवारी गांव में आज से 20 वर्ष पूर्व शंभू नदी से जमीन कटनी शुरू हुई थी। इसके बाद पीछे की पहाड़ी भी दरकने लगी। 2010 से 2013 में आई आपदाओं में गांव के हर हिस्से में जबरदस्त भूस्खलन हुआ। गांव के खेत से लेकर रास्ते भी बह गए। लंबे समय तक लोगों को जंगलों में टेंटों में रहना पड़ा।
खतरे को देखते हुए शासन ने इस गांव को अतिसंवेदनशील घोषित करते हुए गांव के ही दूसरे सुरक्षित स्थान पर विस्थापित कर दिया। खतरे की जद में आए 64 परिवारों को मकान बनाने के लिए पांच-पांच लाख रुपये दिए। अधिकांश परिवार अब नए स्थान पर ही रहते हैं। इस नई चयनित भूमि में केवल दो कमरों का मकान होने से खेती-पशुपालन से जुड़े कुछ परिवार मवेशियों को पुराने घरों में ही बांधने को मजबूर हैं। बिना बारिश के ही जमीन के फटने की घटना से अब ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है। ग्रामीणों को भय है कि कहीं यह स्थान भी खतरे में आया तो उन्हें एक बार फिर विस्थापन का दंश झेलना पड़ेगा।
गांव में पिछले दो दशकों से आपदा आ रही है। शंभू नदी से जमीन का कटाव शुरू हुआ था। सरकारों से लगातार सुरक्षा की मांग की गई। इसके बावजूद नदी से हो रहे कटाव को रोकने के लिए कोई इंतजाम नहीं किए गए। आज पूरा गांव आपदा की पीड़ा को झेल रहा है।
- किशन सिंह दानू, ग्राम प्रधान कुंवारी।