बागेश्वर। कुमाऊं की रामलीला की परंपरा समय के साथ अपनी विशिष्टता और पहचान को मजबूत करती रही है। रंगीली नाकुरी की खास पहचान वाले बागेश्वर के दुर्गम क्षेत्र में एक रामलीला ऐसी है जिसकी शुरुआत के लिए देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी से पहली बार स्कि्रप्ट लाई गई। 76 वर्ष पहले अस्तित्व में आए इस आयोजन ने लोगों के दिलों में खास जगह बना ली। यह स्कि्रप्ट इतनी लयबद्ध और रोचक थी कि इसके लिए बाकायदा संगीत निर्देशक की नियुक्ति की गई।
बात है वर्ष 1949 की। पचार गांव के वंशीधर पांडेय ने किड़ई-पचार की रामलीला शुरू कराई थी। वह बनारस से रामलीला मंचन के गुर सीखकर आए थे। पहली बार पचार में आयोजित रामलीला में राम का पात्र निभाने के लिए कपकोट से कलाकार को बुलाया गया था। संगीत की जिम्मेदारी अल्मोड़ा से आए गुलाम उस्ताद को मिली थी।
पचार गांव के लालमणि ईजर में पहली बार रामलीला आयोजित की गई थी। यह स्थान रामलीला के संस्थापक वंशीधर पांडेय के परिवार वालों ने आयोजन के लिए उपलब्ध कराया था। पहली बार आयोजित रामलीला में कपकोट से आए भैरव दत्त ने राम का पात्र निभाया। लक्ष्मण का किरदार पचार के ही कांतिबल्लभ पांडेय ने निभाया। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों की यह पहली रामलीला थी। दोफाड़ से धरमघर तक के गांवाें से लोग रामलीला देखने उमड़े थे। 1954 तक वंशीधर ही रामलीला का आयोजन कराते थे। फिर पचार की रामलीला कुछ कारणों से बंद हो गई। 1976 में भुवन पांडेय ने इसे दोबारा शुरू करवाया। उन्होंने 2021 तक रामलीला के निर्देशक की जिम्मेदारी निभाई। वर्तमान में चंद्रशेखर पांडेय रामलीला का निर्देशन कर रहे हैं। वर्तमान में रामलीला का आयोजन जनरल बीसी जोशी स्टेडियम किड़ई में किया जाता है।
जब सांवले रंग की सीता पर उठ गए सवाल
पचार की पहली रामलीला में सीता का पात्र निभाने वाले कलाकार को सांवले रंग के कारण दूसरे साल इस किरदार से हाथ धोना पड़ गया। ग्रामीणों का तर्क था कि धार्मिक पुस्तकों में सीता को गौर रंग का बताया गया है। उन दिनों मेकअप का अधिक इंतजाम नहीं होता था। लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए दूसरे साल की रामलीला में सीता का पात्र किसी अन्य कलाकार को सौंप दिया गया।
एक मुट्ठी चावल के चंदे ने बना दिया इतिहास
किड़ई-पचार की रामलीला ऐतिहासिक पहचान समेटे हुए है। यहां जब पहली बार रामलीला हुई तो आयोजकाें ने क्षेत्रवासियों से एक-एक मुट्ठी चावल का चंदा देने की अपील की थी। लोगों ने इतनी श्रद्धा बरसाई कि कमेटी के पास 12 क्विंटल चावल एकत्र हो गया था। इसी चावल से रामलीला के आयोजन का खर्चा और भोजन का प्रबंध किया गया था।
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जिले में बागेश्वर के बाद रामलीला मंचन पचार गांव में ही शुरू हुआ था। 45 साल तक किड़ई-पचार की रामलीला के निर्देशन का सौभाग्य मिला। स्यांकोट, धरमघर आदि समीपवर्ती गांवों में भी रामलीला शुरू कराने में योगदान देने का मौका मिला। खुशी है कि वर्तमान में हमारी रामलीला विशिष्ट पहचान बना चुकी है। -भुवन चंद्र पांडेय, पूर्व निर्देशक
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15 साल तक रामलीला में हनुमान का पात्र निभाया। अब हारमोनियम वादक और प्रशिक्षक के रूप में नए कलाकारों की अभिनय कला को तराशने का मौका मिल रहा है। संतुष्टि है कि गांव के युवा रामलीला मंचन की धरोहर को कुशलता से आगे बढ़ा रहे हैं। -मदन मोहन पांडेय, कलाकार/संगीतकार,
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करीब 45 साल से रामलीला में तबला वादन की जिम्मेदारी संभालते हुए नए-नए कलाकारों को आगे बढ़ते देखना सुखद है। सीमित संसाधनों के बावजूद लोगों के सहयोग से कुशलता पूर्वक मंचन चला। मनोरंजन के तमाम साधन उपलब्ध होने के बावजूद आज भी रामलीला देखने के लिए काफी लोग उमड़ते हैं। -चंद्रशेखर पांडेय, निर्देशक/संगीतकार
कोट
रामलीला में अभिनय करना बचपन का सपना था। रोजगार की तलाश में गांव छूटा तो यह सपना भी दबकर रह गया था। पिछले चार साल से रामलीला में अलग-अलग किरदार निभाने का मौका मिल रहा है। किड़ई-पचार की रामलीला का इतिहास जितना समृद्ध है उतना ही उज्ज्वल इसका भविष्य है। -देवेंद्र कुमार पांडेय, कलाकार