बागेश्वर। भगवान बागनाथ की नगरी में आयोजित होने वाली रामलीला 78 साल पुरानी है। मनोरंजन के साधन नहीं होने के कारण तब दूर-दूर से ग्रामीण बड़ी संख्या में चीड़ के छिलके जलाकर आते थे।
बागेश्वर में रामलीला मंचन की शुरूआत सबसे पहले 1848 में हुई जो कुछ साल चलने के बाद बंद हो गई। इसके बाद 1927 में एक दिन भरत मिलाप का मंचन होने के साथ ही फिर से बंद हो गई। 1948 में आनंद लाल साह की अध्यक्षता में कमेटी का गठन हुआ। तब से अब तक रामलीला का मंचन लगातार हो रहा है।
रामलीला कमेटी के संरक्षक एवं वरिष्ठ कलाकार शंकर लाल साह बताते हैं कि पहले यहां रामलीला का रंगमंच लकड़ी का बनता था, जिसे कार्यकर्ता आपस में मिलकर बनाते थे। 1996 में पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जवाहर सिंह परिहार ने पांच लाख रुपये की लागत से यहां भव्य रामलीला भवन का निर्माण कराया।
पहले धनुष, बाण, तीर, कमान, मुदगर, फरसा, त्रिशूल और नाव कार्यकर्ता खुद बनाते थे। अब यह सारी चीजें बाजार से मंगा ली जाती हैं। लोग घरों से मालाएं बनाकर लाते थे। अब इन्हें भी बाजारों से खरीदकर लाया जाता है। इसी तरह किरदारों को अच्छे अभिनय के लिए पहले चांदी के सिक्के, कॉपी, किताब, रुमाल और मोजे इनाम में मिला करते थे।