बागेश्वर। प्रकटेश्वर सृजन मंच की ओर से रविवार को प्रकटेश्वर मंदिर में कवि सम्मेलन किया गया। इस मौके पर कवियों ने अपनी नई रचनाएं पेश की।
सम्मेलन में डॉ. केवलानंद कांडपाल ने उनके होठों पर गंगा मचलती रहे और उनकी रुह आचमन को तरसती रहे, डॉ. कुंदन सिंह रावत ने कुछ बातें धरी रह गई, कसक मन की अधूरी रह गई, उन आंखों में जाने क्या क्या था, छलकी नहीं मगर भरी रह गई, डॉ. केशवानंद जोशी ने भारत की राजनीति धखौ धै कस भूचाल ऐगो राजरीतिक ठुल ठुल खिलाड़ी धाराशायी है गयीं विरोधी कौनी आपस में झरेनो हो मोदी फिर ऐ गो, डॉ. राजीव जोशी ने हमसे भी कुछ बात हमारी किया करो, सोच समझ कर दुनियादारी किया करो, जो भी तुम में स्वाभाविक है बोल दो, बात नहीं तुम यूं किरदारी किया करो, कवीता पेश की।
जगदीश दफौटी ने जो दुहाई वायु जल को दे चले वो उगाते ताड़ को छत पर मिले, दीप चंद्र पांडे ने मैं जिंदगी फलसफा ढूंढने निकला हूं, सुलगते सवालों का जवाब ढूंढने निकला हूं, डॉ. जितेंद्र तिवारी ने इक क्षण रोते, इक क्षण हंसते बीता यह जीवन सारा, इस तन में दो मन रहते हैं एक कैदी और एक बंजारा और प्रशांत पांडे ने छल, प्रपंच सभी हो क्षीण निस्तेज अहो, किये बढ़ो तुम धर्म ध्वजा प्रज्ञा दीदी जय हो जय हो पंक्तियां सुनाकर तालियां बटोरी।