बागेश्वर। जिन मुद्दों को लेकर राज्य की लड़ाई लड़ी गई थी उनका 18 साल बाद भी बरकरार रहना आंदोलनकारियों में निराशा पैदा करता है। आंदोलनकारियों का मानना है कि समस्याएं दूर तो नहीं हुई बल्कि पहले की अपेक्षा बढ़ गई हैं। रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य की समस्याएं और भी ज्यादा गंभीर हो गई है। राज्य आंदोलनकारियों का मानना है कि सत्ता में आने वाले राजनीतिक दलों ने राज्य गठन की मूल अवधारणा को ही भुला दिया है। राजनीतिक दलों ने समस्याओं का निदान करने की बजाय उन्हें बढ़ाने का ही काम किया है। स्थायी राजधानी के सवाल को भी आंदोलनकारियों ने भटकाने व राजनीतिक लाभ लेने की ही कोशिश की।
कोट................
राज्य गठन की मूल अवधारणा को सत्ता में आने वाली ताकतों ने खत्म कर दिया है। उत्तराखंड आज महज यूपी का उपनिवेश बनकर रह गया है। पलायन, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य के क्षेत्र में राजनीतिक दल कोई कार्य नहीं कर सके। अब तक सत्ता में रहने वाली ताकतों ने महज कुर्सी बचाने का ही कार्य किया।
- महेश परिहार, राज्य आंदोलनकारी
उत्तराखंड गठन के 18 साल बाद भी पलायन की समस्या कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। राज्य में रोजगार बढ़ाने के कार्य होने चाहिए थे। जो कि नहीं हो सके। स्थायी राजधानी के सवाल पर भी ठोस नीति नहीं बन सकी। प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य की हालत खस्ता है।
- प्रताप कबडोला, राज्य आंदोलनकारी
प्रदेश में बारी-बारी से सत्ता संभालने वाली सरकारों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पलायन, रोजगार की दिशा में कोई कार्य नहीं किया। सरकारों ने यूपी की राजनीतिक संस्कृति को अपनाते हुए प्रदेश की आंदोलनकारी ताकतों को कुचलने का प्रयास किया। आलम यह है कि उत्तराखंड राज्य खुशहाल होने के बजाय बदहाल हो गया है।
- खड़क राम आर्य, राज्य आंदोलनकारी