कार्तिक पूर्णिमा स्नान को गंगा की रेती तिगरी धाम का नजारा अन्य सालों से जुदा था। मौसम सुहाना होने के साथ ही दूर-दूर तक सिर्फ जनसैलाब ही नजर आ रहा था।
करीब 10 किलोमीटर दूर तक आस्था का समुंदर फैला था जो पिछले साल के मुकाबले अधिक था। गंगा पार गढ़ का मेला भी दूर तक फैला दिख रहा था। गंगा के दोनों ओर समानांतर तंबुओं की नगरी बस गई। इस नजारे को देखकर हर कोई स्तब्ध था और जुबां से नमामि गंगे के बोल फूट रहे थे।
हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा के दोनों घाटों तिगरी और गढ़ में तंबुओं का शहर बसता है। सप्ताहभर पहले से श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है। जो रेत के मैदान पर बसेरा बनाकर रहते हैं।
इस साल भी गंगा के दोनों किनारों पर 18 नवंबर से तंबुओं का अस्थायी शहर बसना शुरू हो गया था जो मुख्य स्नान यानि बुधवार से एक दिन पहले दूर तक फैल चुका था।
प्रशासनिक स्तर से चार-पांच किलोमीटर क्षेत्रफल का अंदाजा लगाते हुए व्यवस्थाएं की गई थीं। मगर, जब श्रद्धालुओं का रेला उमड़ा तो प्रशासन की ओर से की गई व्यवस्थाओं को फेल करते हुए 10 किलोमीटर तक आस्था का समंदर फैल गया।
यह पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुना था। ऐसा ही नजारा गंगा पार गढ़ मेले का भी था। ऐसा लगा रहा था, मानो आज गंगा के दोनों किनारों पर आस्था का समुंदर उतर आया हो।