सम्मेलन में पुस्तक का विमोचन करते संसदीय कार्य मंत्री प्रकाश पंत।
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कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव लाया जाएगा। राज्य के रचनाकारों को उनकी रचनाओं का प्रकाशन का मौका देने के साथ ही उनकी पुस्तकों का निशुल्क प्रकाशन करते हुए उन्हें मानदेय के रूप में 15 हजार रुपये दिए जाएंगे। यह बात संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत ने राष्ट्रीय कुमाऊंनी भाषा सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि कही। उन्होंने कहा कि कुमाऊंनी और गढ़वाली रचनाकारों की कई पुस्तकें उच्च शिक्षा के छात्र-छात्राओं के पाठ्य पुस्तकों में शामिल हो गई हैं। जल्द ही सरकार प्राथमिक स्तर पर भी इन पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में काम कर रही है। इधर राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा ने भी विचार रखे और समिति को सभागार बनाने के लिए सांसद निधि से दस लाख रुपये देने की घोषणा की।
कुमाऊंनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति की ओर से आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए पंत ने कहा कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जो प्रयास कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषाओं को विकसित करने के लिए किए गए वह वास्तव में सराहनीय हैं। उन्होंने बताया कि भाषा विभाग द्वारा कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा रहे हैं। शीघ्र ही कवियों, साहित्यकारों और लेखकों के नाम से पुरस्कार दिए जाने की व्यवस्था की जा रही है। उन्होंने कहा कि अंब्रेेला एक्ट के तहत ऊर्दू, हिंदी और लोकभाषा को लाने का भी प्रयास किया जाएगा। इस मौके पर उन्होंने त्रिभुवन गिरि महाराज द्वारा लिखित गोरिल काव्य का भी विमोचन किया और दामोदर जोशी, ललित सिराड़ी, आनंद वल्लभ जोशी, भैरव दत्त पांडे को उत्कृष्ट लेखन के लिए सम्मानित किया।
इससे पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि देश की बहुत सी भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की प्रतीक्षा में हैं। उन्होंने कहा कि राज्य बन तो गया है लेकिन भाषा अकादमी भी बननी चाहिए। उन्होंने समिति को सभागार बनाने के लिए सांसद निधि से दस लाख रुपये देने और कुमाऊंनी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए अपनी ओर से भी पहल करने का आश्वासन दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. एमपी जोशी ने कहा कि कुमाऊंनी भाषा हिंदी भाषा की जननी है। सोलहवीं शताब्दी तक कुमाऊंनी, गढ़वाली और नेपाली भाषा में कोई विशेष अंतर नहीं था। ये सभी क्षेत्र कत्यूरी शासन के अधीन थे। उन्होंने कहा कि कुमाऊंनी भाषा को प्रभावशाली बनाने के लिए कुमाऊं, गढ़वाल और नेपाल में इसकी जड़ों को तलाशने की जरूरत है। प्रो. शेर सिंह बिष्ट ने कुविवि में कुमाऊंनी विषय की स्वीकृति के बाद एमए की कक्षाओं को चलाने के लिए स्वीकृति नहीं मिलने की बात कही।
इस अवसर पर उत्तराखंड भाषा अकादमी और कुमाऊंनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजने की मांग की गई। इसके अलावा लेखकों को पुस्तकों के प्रकाशन हेतु राज सहायता देने, रचनाकारों के लिए मूल निवास की बाध्यता समाप्त करने, उत्तराखंड में भाषा अकादमी में लेखकों को शामिल करने आदि की भी मांग संबंधी ज्ञापन राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा को सौंपा गया। सम्मेलन को केवल सती, गोविंद बल्लभ बहुगुणा, बिट्टू कर्नाटक, गिरीश चंद्र बिष्ट ने भी संबोधित किया। अध्यक्षता ललित सिंह सिराड़ी और संचालन नीलम नेगी ने किया। इस अवसर पर नगर समेत विभिन्न जगहों से पहुंचे साहित्यकार मौजूद थे।